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वशिष्ठ वाणी की ग्राउंड रिपोर्ट: गोरेगांव में ‘सरकारी मिलीभगत’ का खेल, इनऑर्बिट मॉल के पीछे की सड़क बनी निजी बस अड्डा!

मुंबई: क्या गोरेगांव RTO और ट्रैफिक पुलिस की ड्यूटी केवल आम आदमी का चालान काटने तक सीमित है? इनऑर्बिट मॉल के पीछे की सड़क का नजारा देखकर तो यही लगता है कि यहाँ कानून का राज नहीं, बल्कि अवैध बस ऑपरेटरों की ‘मर्जी’ चलती है। सरेआम सार्वजनिक सड़क को निजी पार्किंग में तब्दील कर दिया गया है, और जिम्मेदार विभाग ‘कुंभकर्णी नींद’ में सोए हुए हैं।

ये तीखे सवाल, जो सिस्टम को कठघरे में खड़ा करते हैं:

  1. RTO की चुप्पी का राज क्या है? क्या गोरेगांव RTO के अधिकारियों को हर दिन वहां खड़ी दर्जनों अवैध बसें दिखाई नहीं देतीं, या उन्हें देखने के लिए किसी ‘विशेष’ शिकायत का इंतजार रहता है?
  2. सड़क जनता के लिए है या बस ऑपरेटरों के मुनाफे के लिए? जब इन बस ऑपरेटरों ने गाड़ियां खरीदने के लिए करोड़ों का निवेश किया है, तो पार्किंग के लिए जगह खरीदने का पैसा उनकी जेब से क्यों नहीं निकलता? सार्वजनिक सड़क पर कब्ज़ा करके वे किस अधिकार से व्यापार कर रहे हैं?
  3. क्या ये ‘हफ्ता वसूली’ का हिस्सा है? जब स्थानीय लोग और जागरूक नागरिक बार-बार अवैध पार्किंग की शिकायत करते हैं, तो भी कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या प्रशासन और इन ऑपरेटरों के बीच कोई ‘अलिखित समझौता’ है?
  4. आम जनता की सुरक्षा का जिम्मेदार कौन? सड़क पर बसों की अवैध पार्किंग से आए दिन जाम की स्थिति बनी रहती है। अगर कोई एम्बुलेंस वहां फंस गई और किसी की जान चली गई, तो क्या RTO और स्थानीय प्रशासन इसकी जिम्मेदारी लेगा?
  5. शिकायत का इंतज़ार क्यों? क्या सरकारी अधिकारियों का जमीर केवल तभी जागता है जब कोई ऊंचे स्तर पर शिकायत करता है? क्या अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए भी ‘जगाए’ जाने की ज़रूरत है?

‘वशिष्ठ वाणी’ की सीधी चुनौती

सड़क पर खड़ी ये बसें केवल गाड़ियां नहीं, बल्कि प्रशासन की नाकामी का जीता-जागता सबूत हैं। ‘वशिष्ठ वाणी’ इनऑर्बिट मॉल के पीछे के इस अवैध अड्डे की पूरी कुंडली खंगाल रही है। हम पूछना चाहते हैं कि आखिर ये सड़क कब इन अवैध कब्ज़ों से मुक्त होगी?

प्रशासन को चेतावनी: यदि जल्द ही इस अवैध पार्किंग को नहीं हटाया गया, तो यह सवाल केवल एक न्यूज़ नहीं, बल्कि आरटीआई और जनहित याचिका (PIL) का आधार बनेगा।

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