भारत के संसदीय इतिहास में आज जो तस्वीरें उभर रही हैं, वे किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए शर्मनाक हैं। जब संसद का मंदिर ‘जनसेवा’ के बजाय ‘खरीद-फरोख्त का बाज़ार’ बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र आईसीयू (ICU) में है। TMC सांसद कीर्ति आजाद द्वारा किए गए खुलासे ने उस कड़वी सच्चाई को सामने ला दिया है, जिसे अब तक दबी जुबान में केवल गलियारों में चर्चा किया जाता था।
• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)

क्या अब ‘जनादेश’ का कोई मोल नहीं?
देश के मतदाता 5 साल के लिए अपना प्रतिनिधि चुनते हैं ताकि वह संसद में उनकी आवाज़ बने। लेकिन आज खेल कुछ और ही है। सत्ता के गलियारों में अब ‘बहुमत’ का अर्थ जनसमर्थन नहीं, बल्कि ‘सांसदों का स्टॉक’ बन गया है। आरोप है कि कहीं 5 करोड़ की नकदी तो कहीं मासिक ‘पेंशन’ के नाम पर सांसदों को पाला बदलने के लिए मजबूर किया जा रहा है। सवाल यह है—क्या यही ‘विकसित भारत’ की परिभाषा है? जहाँ संविधान की शपथ लेने वाले लोग ही अपनी निष्ठा को नीलाम कर रहे हैं?
लोकसभा अध्यक्ष और एजेंसियों की भूमिका पर उठे सवाल
संवैधानिक मर्यादाओं के रक्षक कहे जाने वाले पदों पर बैठे लोगों की चुप्पी और कार्यप्रणाली अब आम जनता की समझ से परे हो गई है। जब केंद्रीय एजेंसियां—ED, CBI और आयकर विभाग—केवल विपक्षी खेमों के घरों की शोभा बढ़ाती दिखें और सत्ता पक्ष के लिए ‘क्लीन चिट’ बाँटती फिरें, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की कार्यशैली पर उठते सवाल यह दर्शाते हैं कि संसद में अब विपक्ष की आवाज़ को ‘म्यूट’ करने का एक सुनियोजित एजेंडा चलाया जा रहा है।
सावधान! लोकतंत्र की जड़ें खोखली हो रही हैं
यह केवल एक पार्टी या एक सांसद की बात नहीं है। यह उन करोड़ों लोगों के विश्वास का प्रश्न है जिन्होंने लोकतंत्र को ज़िंदा रखा है। यदि आज हम चुप रहे, तो कल हमें यह पूछने का हक भी नहीं होगा कि हमारे क्षेत्र का विकास क्यों रुका? हमारे अधिकार क्यों छीने जा रहे हैं? जिस तरह से डरा-धमकाकर या लालच देकर नेताओं को तोड़ा जा रहा है, वह स्पष्ट करता है कि अब कानून नहीं, ‘सत्ता की सनक’ देश चला रही है।
जनता के नाम संदेश:
लोकतंत्र ‘खरीदने’ की चीज़ नहीं, बल्कि ‘बचाने’ का संकल्प है। आज यदि सत्ता के इस ‘गंदे खेल’ के खिलाफ आम जनता खड़ी नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। समय आ गया है कि इन ‘सौदेबाज़ों’ से सवाल पूछा जाए—क्या लोकतंत्र केवल कागजों पर है, या अब यह सिर्फ बिकाऊ माल है?














