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‘वशिष्ठ वाणी’ का सीधा सवाल: कमिश्नर साहब, PSI प्रफुल पर एक्शन कब? शैलेंद्र नगरकर हर बार क्यों बचाते हैं?

मुंबई (विशेष प्रतिनिधि): मुंबई पुलिस का नारा है—“सदाचारणाय खलनिग्रहणाय” (सज्जनों का रक्षण और दुष्टों का दमन)। लेकिन मालवणी पुलिस चौकी में जो कुछ भी हो रहा है, उसे देखकर लगता है कि यहाँ नारा बदलकर “नेताओं की चाकरी और रसूखदारों को संरक्षण” हो चुका है। मालवणी पुलिस चौकी में तैनात PSI प्रफुल द्वारा आधी रात को मदद मांगने आईं पीड़ित महिलाओं के साथ की गई बदसलूकी का मामला अब पूरी तरह तूल पकड़ चुका है।

‘वशिष्ठ वाणी’ द्वारा लगातार सबूतों के साथ इस खबर को उजागर किए जाने के बाद भी मुंबई पुलिस के आला अधिकारियों का मौन यह साबित करने के लिए काफी है कि मुंबई पुलिस की ‘कथनी और करनी’ में जमीन-आसमान का फर्क है।

वरिष्ठ अधिकारी शैलेंद्र नगरकर की भूमिका पर गंभीर सवाल: रक्षक या मददगार?

इस पूरे मामले में सबसे शर्मनाक भूमिका मालवणी पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी शैलेंद्र नगरकर की सामने आ रही है। नियम और कानून के मुताबिक, आधी रात को लाचार महिलाओं के साथ बदसलूकी करने वाले अधिकारी पर तुरंत अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए थी। लेकिन सूत्रों और घटनाक्रमों से साफ है कि शैलेंद्र नगरकर कार्रवाई करने के बजाय हर बार PSI प्रफुल को बचाने की ढाल बन जाते हैं।

वरिष्ठ अधिकारी के लिए शायद यह कोई गंभीर विषय ही नहीं है कि उनके मातहत काम करने वाला एक PSI, महिलाओं की मामूली एनसी (NC) दर्ज करने के लिए उन्हें घंटों प्रताड़ित करता है। जब रसूखदार और जागरूक महिलाओं को पुलिस चौकी के भीतर ऐसा मानसिक सदमा झेलना पड़ सकता है, तो किसी लाचार या गरीब महिला के साथ यह तंत्र कैसा बर्ताव करता होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

‘वशिष्ठ वाणी’ के पास पुख्ता सबूत: पीड़ित महिला का ऑन-रिकॉर्ड बयान

मुंबई पुलिस के जो अधिकारी शायद इस मुगालते में हैं कि वे इस मामले को रफा-दफा कर देंगे, उन्हें ‘वशिष्ठ वाणी’ यह साफ कर देना चाहती है कि हमारे पास इस पूरी घटना के पुख्ता और अकाट्य सबूत मौजूद हैं।

“पीड़ित महिलाओं में से एक महिला ने ‘वशिष्ठ वाणी’ के कैमरे पर ऑन-रिकॉर्ड आकर सारा सच बयान किया है। महिला ने साफ शब्दों में कहा है कि यदि उन्हें कोर्ट, कमिश्नर या किसी भी जांच एजेंसी के सामने जाना पड़े, तो वे यह बताने के लिए पूरी तरह तैयार हैं कि किस तरह PSI प्रफुल ने उनकी एनसी (NC) दर्ज करने में आनाकानी की और मानसिक रूप से परेशान किया।”

अब सवाल यह उठता है कि इतने पुख्ता सबूत होने के बाद भी मुंबई पुलिस के हाथ क्यों कांप रहे हैं?


नेताओं से मिलता है प्रमोशन, इसलिए मीडिया की खबरों से परहेज?

जनता के बीच अब यह संदेश साफ जा चुका है कि मुंबई पुलिस का सिस्टम पूरी तरह सड़ चुका है। आज अगर किसी बड़े राजनेता या सत्ताधारी दल के नेता ने वरिष्ठ अधिकारी शैलेंद्र नगरकर को सिर्फ एक फोन घुमा दिया होता, तो अब तक PSI प्रफुल लाइन हाजिर या सस्पेंड हो चुके होते। ऐसा इसलिए, क्योंकि नेताओं की जी-हजूरी करने से मलाईदार पोस्टिंग और समय पर प्रमोशन मिलता है!

दूसरी तरफ, ‘वशिष्ठ वाणी’ जैसी निष्पक्ष मीडिया जब सबूतों के साथ जनता की आवाज उठाती है, तो उसे जानबूझकर अनदेखा किया जाता है। क्योंकि मीडिया से अधिकारियों को प्रमोशन की सिफारिश नहीं, बल्कि उनकी कमियों को उजागर करने वाले तीखे सवाल मिलते हैं।


कमिश्नर साहब! क्या आप भी आंखें मूंदकर बैठे रहेंगे?

‘वशिष्ठ वाणी’ अब सीधे मुंबई पुलिस कमिश्नर से यह सवाल पूछती है:

  • सवाल 1: कमिश्नर साहब, क्या कानून की धज्जियां उड़ाने वाले और महिलाओं का अपमान करने वाले PSI प्रफुल पर आपके स्तर से कोई सीधी कार्रवाई (Suspension) होगी?
  • सवाल 2: क्या अपनी खाकी के इस ‘दाग’ को छुपाने और प्रफुल को बार-बार बचाने वाले वरिष्ठ अधिकारी शैलेंद्र नगरकर से इस लापरवाही का जवाब मांगा जाएगा?
  • सवाल 3: या फिर हर बार की तरह इस बार भी मुंबई पुलिस मुख्यालय इस गंभीर मामले पर अपनी आंखें मूंदकर बैठ जाएगा और जनता का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा?

हमारा रुख साफ है: ‘वशिष्ठ वाणी’ इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाएगी। जब तक पीड़ित महिलाओं को न्याय नहीं मिलता और दोषी पुलिसकर्मियों पर गाज नहीं गिरती, तब तक हमारी कलम शांत नहीं होगी। जनता अब केवल तमाशा नहीं देखेगी, इस मामले में आर-पार की कार्रवाई होनी ही चाहिए!

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