आस्था की आड़ में कानूनों की धज्जियां उड़ाने की तैयारी..
मुंबई: मुंबई में त्योहारों का मौसम दस्तक देने ही वाला है, लेकिन इसके साथ ही मुंबईकरों के लिए एक पुरानी और दर्दनाक समस्या फिर से सिर उठाने लगी है। जिन फुटपाथों और सार्वजनिक रास्तों पर आम नागरिकों को सुरक्षित चलने का अधिकार है, उन्हें एक बार फिर “धर्म के व्यापारियों” के हवाले करने की तैयारियां बैकस्टेज शुरू हो चुकी हैं। सबसे बड़ा और शर्मनाक सवाल देश की सबसे अमीर महानगरपालिका, BMC (बृहन्मुंबई नगर निगम) पर खड़ा हो रहा है, जो आम जनता को सुरक्षा देने के बजाय, ऐसा लग रहा है जैसे खुद आगे बढ़कर इन कब्ज़ाधारियों के लिए रास्ता साफ करवा रही है।
आस्था की आड़ में कानूनों की धज्जियां उड़ाने की तैयारी..
हर साल की तरह इस बार भी मुंबई के विभिन्न इलाकों में फुटपाथों पर अस्थायी मंडप, मूर्ति बिक्री केंद्र और भारी-भरकम अवैध ढांचे खड़े होने की आहट सुनाई देने लगी है। नतीजा यह होता है कि पैदल चलने वालों के लिए बनी जगह पूरी तरह गायब हो जाती है।
बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को अपनी जान जोखिम में डालकर भारी ट्रैफिक के बीच सड़कों पर चलना पड़ता है। ऐसे में यदि कोई दुर्घटना होती है या घंटों ट्रैफिक जाम लगता है, तो उसकी जिम्मेदारी लेने के लिए कोई आगे नहीं आता। आखिर आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों की इस तरह सरेआम धज्जियां क्यों उड़ाई जा रही हैं?
BMC की भूमिका पर तीखे सवाल: क्या प्रशासन ही बना रहा है रास्ता?
इस पूरे मामले में BMC की कार्यप्रणाली सबसे ज्यादा संदेहास्पद और निराशाजनक है। आम जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि:
- चुनिंदा मेहरबानी क्यों? यदि कोई गरीब रेहड़ी-पटरी वाला पेट पालने के लिए फुटपाथ पर बैठता है, तो BMC की गाड़ियां तुरंत उसका सामान जब्त करने पहुंच जाती हैं। लेकिन जब “धर्म और आस्था” का चोला ओढ़कर बड़े-बड़े रसूखदार और व्यापारी फुटपाथों को ब्लॉक करते हैं, तो BMC की आंखें बंद क्यों हो जाती हैं?
- क्या यह राजनीतिक दबाव है या अंदरूनी साठगांठ? जहां-जहां ये अवैध मंडप और दुकानें सजती हैं, वहां स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स और बैनर चमकने लगते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि BMC प्रशासन इन ‘धर्म के व्यापारियों’ के सामने पूरी तरह घुटने टेक चुका है और जनहित को ताक पर रखकर इन्हें मूक सहमति दे रहा है।
एक बड़ा सवाल: क्या कानून की किताबें सिर्फ आम और मजबूर नागरिकों को डराने के लिए हैं? क्या सार्वजनिक संपत्तियों पर अवैध कब्ज़ा करने वालों को प्रशासन की तरफ से कोई ‘विशेष वीआईपी छूट’ प्राप्त है?
यह आस्था का नहीं, नागरिक अधिकारों का मुद्दा है
यह स्पष्ट करना बेहद जरूरी है कि यह मुद्दा किसी धर्म, त्योहार या व्यक्तिगत आस्था के खिलाफ नहीं है। आस्था का सम्मान हर नागरिक के दिल में है और होना भी चाहिए। लेकिन जब आस्था के नाम पर ‘व्यापार’ होने लगे और उसकी कीमत आम जनता को अपनी जान जोखिम में डालकर चुकानी पड़े, तो वहां आवाज उठाना अनिवार्य हो जाता है।
फुटपाथ जनता के टैक्स के पैसे से, जनता के चलने के लिए बने हैं, न कि किसी के व्यावसायिक या राजनीतिक फायदे के लिए।
जनहित में जारी: अब तो जागिए कमिश्नर साहब!
यदि BMC प्रशासन और नगर निगम के आला अधिकारी वास्तव में खुद को जनसेवक मानते हैं, तो उन्हें तुरंत नींद से जागना होगा। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना ही होगा कि त्योहारों की आड़ में किसी भी नाम पर सार्वजनिक रास्तों और फुटपाथों पर अतिक्रमण न हो।
मुंबईकरों को उनका सुरक्षित चलने का अधिकार वापस मिलना चाहिए। फुटपाथ जनता के हैं, और इन्हें ‘धर्म के व्यापारियों’ या कब्ज़ाधारियों की जागीर बनने से रोकना BMC की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है।
– विशेष खोजी रिपोर्ट (जनहित में जारी)














