— वशिष्ठ वाणी एक्सक्लूसिव (विशेष रिपोर्ट)
नई दिल्ली / जंतर-मंतर: 20 जुलाई को जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्ग तक का नज़ारा राजनीति के उस गंदे और घिनौने चेहरे को बेनक़ाब कर गया, जिसकी चेतावनी ‘वशिष्ठ वाणी’ ने पहले ही दे दी थी। हमने शुरुआत में ही अपने पाठकों को आगाह किया था कि यह पूरा घटनाक्रम असल मुद्दों की लड़ाई कम और राजनीति का मोहरा बनाने का खेल ज़्यादा है।
20 तारीख को जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी युवाओं पर पुलिस का क्रूर लाठीचार्ज हुआ, कई युवाओं के सर फटे, ख़ून बहा और लोग लहूलुहान होकर सड़कों पर गिरते रहे—तब सबसे बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ कि 20 तारीख को संसद की ओर ‘मार्च’ का आह्वान करने वाले ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के संस्थापक और मुख्य चेहरे उस वक़्त कहाँ नदारद थे?
‘तुम आगे बढ़ो, हम पीछे से आते हैं’ का वही पुराना राजनीतिक खेल?
सोशल मीडिया पर लाखों फ़ॉलोअर्स के दम पर “देश का नक्शा बदल देने” का दावा करने वाले कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक और उनकी टीम आख़िर उस वक़्त उस भीड़ के बीच में क्यों नहीं खड़ी थी जब लाठियाँ चल रही थीं?
- क्या युवाओं को आगे ढकेलकर खुद पीछे सुरक्षित खड़े रहने का वही पुराना राजनीतिक फॉर्मूला यहाँ भी अपनाया गया?
- ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि जब कॉकरोच जनता पार्टी ने दिल्ली आने का आह्वान किया था, तो उनके सोशल मीडिया फ़ॉलोअर्स की तुलना में महज़ 1-2% जनता ही पहुँची थी।
- लेकिन 20 जुलाई को युवाओं और आम जनता का जनसैलाब तब उमड़ा, जब सोनू वांगचुक के साथ पुलिसिया बर्बरता की तस्वीरें सामने आईं। सूत्रों के मुताबिक, उन्हें चादर से घेरकर थप्पड़ मारने और अभद्रता करने का आरोप लगा (हालाँकि प्रशासन इसकी पुष्टि नहीं करता)। इस बर्बरता को देखकर गुस्साए लाखों युवा जंतर-मंतर पहुँचे। लेकिन जब लाठीचार्ज हुआ, तो युवाओं ने दर्द झेला, नेताओं ने नहीं।
एक दिन का ‘आमरण अनशन’ और राजनीति की गंध
सोनू वांगचुक को जैसे ही पुलिस अस्पताल ले गई, कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक तुरंत ज़मीन पर बैठ गए और ‘आमरण अनशन’ का बड़ा ऐलान कर दिया। लेकिन हैरत की बात देखिए—वह अनशन महज़ एक ही दिन में टूट भी गया!
- आख़िर बंद कमरों में ऐसी कौन सी बातचीत हुई कि एक दिन में अनशन ख़त्म हो गया?
- इस पूरी पटकथा के पीछे की हकीकत यह है कि कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक का अतीत ‘आम आदमी पार्टी’ से जुड़ा रहा है। यह पूरी रणनीति राजनीतिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित दिखती है।
- जिस तरह अतीत में आंदोलन की कोख से राजनीतिक पार्टियाँ निकलीं, सत्ता में आईं और वीआईपी कल्चर में ढल गईं, ठीक वही राह कॉकरोच जनता पार्टी भी पकड़ रही है।
सोशल मीडिया के भ्रम और जनता के घमंड का सच
सोशल मीडिया के ‘लाइक’ और ‘फ़ॉलोअर्स’ के आंकड़े देखकर नेताओं को यह मुग़ालता हो गया था कि वे जब चाहें, जैसा चाहें, भारत के रुख़ को मोड़ सकते हैं। सत्ता पाने की इसी चाह में युवाओं के कंधे पर बंदूक रखकर चलाई गई।
- लाठियाँ जनता ने खाईं, सर युवाओं के फटे, अस्पताल आम लोग पहुँचे।
- लेकिन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के आकाओं को एक खरोंच तक नहीं आई, क्योंकि राजनीति के इस खेल में कौन सा पैंतरा कब बदलना है, यह वे अच्छी तरह जानते हैं।
‘वशिष्ठ वाणी’ के तीखे सवाल:
- जंतर-मंतर पर जब युवाओं का ख़ून बह रहा था, तब आंदोलन की कमान संभालने का दावा करने वाले नेता किस कोने में छिपे थे?
- सोनू वांगचुक के हटते ही आमरण अनशन का नाटक और 24 घंटे में उसका समापन—यह समझौता था या आत्मसमर्पण?
- क्या युवाओं को केवल अपनी नई राजनीतिक पार्टी के कैडर और वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है?
जनता और युवा अब समझदार हो चुके हैं। अगर आंदोलन के नाम पर सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकनी हैं और लाठियों के आगे युवाओं को ढकेलना है, तो ऐसे आकाओं से जवाब माँगा ही जाएगा।
(यदि किसी के पास घटना के समय इन नेताओं की मौजूदगी या अनुपस्थिति का कोई तथ्य/वीडियो हो, तो ‘वशिष्ठ वाणी’ से साझा करें।)














