पी/उत्तर वार्ड से लेकर मुख्यालय तक हर टेबल पर है ‘कोयला वाली गली’ के अवैध निर्माण की कुंडली, फिर भी क्यों नहीं चल रहा बीएमसी का हथौड़ा? वशिष्ठ वाणी की लगातार 53वें दिन भी बेबाक रिपोर्टिंग।
विशेष खोजी रिपोर्ट: वशिष्ठ वाणी ब्यूरो
मालाड (मुंबई): वक्त बदल रहा है, तारीखें बदल रही हैं, लेकिन मुंबई के प्रशासनिक घालमेल की जमीनी हकीकत नहीं बदल रही। मालाड वेस्ट के भद्रन नगर (रोड नंबर 1) स्थित ‘कोयला वाला गली’ में रेलवे ट्रैक के पास खड़ा अवैध निर्माण अब केवल एक कंक्रीट का ढांचा नहीं, बल्कि बीएमसी (BMC) की रीढ़विहीन कार्यप्रणाली का खुला सबूत बन चुका है। कल तक जो मामला 52 दिनों का था, वह आज 53वें दिन (1272 घंटे) में प्रवेश कर चुका है।
इस पूरे प्रकरण में अब सबसे बड़ा और कड़वा सच यह सामने आ रहा है कि इस अवैध साम्राज्य की जानकारी बीएमसी कमिश्नर से लेकर स्थानीय सांसद और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल तक, सबको बखूबी है। यह कोई ऐसा मामला नहीं है जो फाइलों में छुपा हो, बल्कि इस पर खुद प्रशासन ने मुहर लगाई है। लेकिन सवाल यह है कि ‘सब कुछ जानने’ के बाद भी यह रहस्यमयी चुप्पी और कार्रवाई से परहेज क्यों? क्या सत्ता और रसूख के आगे पूरा प्रशासनिक तंत्र घुटने टेक चुका है?
कुंदन वळवी का नोटिस: केवल कागजी औपचारिकता?

पी/उत्तर (P/North) वार्ड के सहायक आयुक्त कुंदन वळवी के दफ्तर से 21 मई 2025 को इस अवैध निर्माण के खिलाफ नोटिस जारी किया गया था। बीएमसी के नियमों के मुताबिक, नोटिस के बाद तय समय सीमा में अवैध ढांचे पर पीला पंजा चलना अनिवार्य है।

लेकिन जब मीडिया लगातार 53 दिनों से पक्के सबूतों और लाइव तस्वीरों के साथ इस अवैध निर्माण को उजागर कर रहा है, तब भी अतिक्रमण विरोधी दस्ते का शांत बैठे रहना यह साबित करता है कि ऊपरी आदेशों और रसूखदार ‘कर्सन’ के प्रभाव के आगे नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। अधिकारियों को सब पता है, शिकायतें उनकी टेबल पर हैं, लेकिन उनके हाथ किसी अदृश्य ताकत ने बांध रखे हैं।
आज के 3 सबसे तीखे और सीधे सवाल:
- कमिश्नर साहब, जब सब पता है तो कार्रवाई क्यों नहीं? बीएमसी के आला अधिकारियों और कमिश्नर तक इस मामले की पूरी जानकारी होने के बावजूद फाइल पर एक्शन लेने से कौन रोक रहा है? क्या कानून अब केवल आम नागरिकों के लिए रह गया है?
- सांसद पीयूष गोयल की चुप्पी का क्या मतलब निकाला जाए? अपने संसदीय क्षेत्र में खुलेआम हो रहे इस खेल और बीएमसी की इस ढिलाई पर एक कद्दावर केंद्रीय मंत्री का मौन रहना क्या भू-माफिया के हौसलों को बढ़ावा देना नहीं है?
- 53 दिनों की इस मेहरबानी की कीमत क्या है? नोटिस जारी होने के बावजूद 53 दिनों तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वाले जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? इस लापरवाही की जवाबदेही किसकी है?
निष्कर्ष:
तंत्र चाहे जितना भी आंखें मूंदे बैठा रहे या सब कुछ जानकर भी अनजान बनने का नाटक करे, लेकिन ‘वशिष्ठ वाणी‘ अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटेगी। जब तक ‘कोयला वाली गली’ के इस अवैध निर्माण पर कानून का डंडा नहीं चलता और अधिकारियों की इस मिलीभगत का पूरी तरह पर्दाफाश नहीं होता, हमारी खोजी पत्रकारिता की यह जंग लगातार जारी रहेगी।













