मुंबई/वशिष्ठ वाणी: मलाड न्यू लिंक रोड पर सड़कों और फुटपाथों पर अवैध पार्किंग का खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है। कानून का डर तो जैसे खत्म ही हो चुका है। कारण? गोरेगांव ट्रैफिक विभाग का सुस्त, ढुलमुल और गैर-जिम्मेदाराना रवैया!
‘वशिष्ठ वाणी’ पिछले 2 महीनों से लगातार जमीनी स्तर पर जाकर ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रही है और प्रशासन का ध्यान इस गंभीर समस्या की ओर खींच रही है। लेकिन गोरेगांव ट्रैफिक विभाग के अधिकारी समस्या को जड़ से खत्म करने के बजाय इसे ‘टालमटोल’ और ‘लीपापोती’ के खेल में तब्दील कर चुके हैं।
1. कड़ा एक्शन नहीं, अवैध कब्जेदारों को ‘अलर्ट’? (फॉरवर्डिंग का खेल)
‘वशिष्ठ वाणी’ जब भी पुख्ता सबूतों के साथ मुंबई आरटीओ को शिकायत भेजती है, तो आरटीओ द्वारा गोरेगांव ट्रैफिक विभाग को कार्रवाई का निर्देश दिया जाता है। लेकिन इसके बाद जो होता है, वह चौंकाने वाला है!
- ट्रैफिक विभाग का काम है मौके पर जाकर गाड़ियों को टो (Tow) करना और भारी जुर्माना लगाना।
- लेकिन कार्रवाई करने के बजाय, ट्रैफिक विभाग के अधिकारी शिकायत की कॉपी सीधे रेस्टोरेंट और कार शोरूम मालिकों को फॉरवर्ड कर देते हैं!
- नतीजा? वे तुरंत गाड़ियां हटा लेते हैं और अधिकारी के जाते ही, 1-2 घंटे में फिर से कतारें लग जाती हैं।
सवाल: क्या ट्रैफिक विभाग का काम कानून का पालन कराना है या अवैध पार्किंग करने वालों को ‘सावधान’ करना?
2. एक अधिकारी, कछुआ चाल और रस्म- अदायगी का ‘चालान नाटक’
पूरे रोड पर दर्जनों गाड़ियां लाइन से नो-पार्किंग बोर्ड के नीचे खड़ी रहती हैं। जब ‘वशिष्ठ वाणी’ का दबाव बढ़ता है, तो हफ्ते में एक बार विभाग का महज एक अधिकारी मौके पर टहलते हुए आता है और धीरे-धीरे 2-4 गाड़ियों पर पेनल्टी लगाकर चला जाता है।
- जब दर्जनों गाड़ियां अवैध रूप से खड़ी हैं, तो एक साथ कई अधिकारियों की टीम भेजकर ताबड़तोड़ टोचिंग और चालान कार्रवाई क्यों नहीं की जाती?
- एक अधिकारी भेजकर क्या सिर्फ कागजी खानापूर्ति (आईवॉश) की जा रही है?
3. नो-पार्किंग बोर्ड का मजाक उड़ा रहे शोरूम व रेस्टोरेंट मालिक
रोड पर जगह-जगह ‘NO PARKING’ के सरकारी बोर्ड टंगे हैं। लेकिन रेस्टोरेंट और कार शोरूम के मालिकों को किसी का खौफ नहीं है। उन्हें अच्छी तरह पता है कि ट्रैफिक पुलिस जमीनी स्तर पर कोई ठोस और सख्त कदम नहीं उठाएगी। जब बार-बार शिकायत के बाद भी हालात जस के तस हैं, तो यह सोचना जायज है कि क्या इसमें ट्रैफिक विभाग की मौन सहमति या मिलीभगत है?
अधिकारियों को मिर्ची क्यों लगती है?
जब ‘वशिष्ठ वाणी’ प्रशासन की इस लापरवाही पर सवाल उठाती है या मिलीभगत की बात करती है, तो अधिकारियों को बुरा लग जाता है। लेकिन साहब, बुरा मानने से काम नहीं चलेगा—कार्रवाई करके दिखाइए! जिस दिन आप सड़क खाली करवा देंगे, ‘वशिष्ठ वाणी’ सबसे पहले आपकी तारीफ करेगी।
‘वशिष्ठ वाणी’ के सीधे और चुभते सवाल:
- क्या ‘वशिष्ठ वाणी’ को रोज ग्राउंड रिपोर्टिंग करके रोज ही शिकायत दर्ज करानी पड़ेगी? 2 महीने की लगातार शिकायतों का कोई मोल नहीं?
- क्या गोरेगांव ट्रैफिक विभाग एक बार कड़ा कदम उठाकर इस अवैध पार्किंग को जड़ से खत्म नहीं कर सकता?
- अगर कार्रवाई नहीं करनी है, तो विभाग औपचारिक ऐलान क्यों नहीं कर देता?
स्पष्ट चेतावनी:
अगर गोरेगांव ट्रैफिक विभाग को कार्रवाई करने में आलस आ रहा है, तो वे सार्वजनिक रूप से ऐलान कर दें कि—“नो-पार्किंग का बोर्ड सिर्फ शो-पीस है, ‘वशिष्ठ वाणी’ शिकायत करना बंद करे, हम किसी पर सख्त कार्रवाई नहीं करेंगे।” फिर ‘वशिष्ठ वाणी’ भी शिकायत करना छोड़ देगी!
लेकिन जब तक जनता का हक छीना जाएगा और नियमों की धज्जियां उड़ेंगी, ‘वशिष्ठ वाणी’ का कलम और कैमरा शांत नहीं बैठेगा!













