मुंबई/वशिष्ठ वाणी: मालाड में इन दिनों विकास कार्यों की सुगबुगाहट हो या न हो, लेकिन चौराहों और मुख्य सड़कों का हाल देखकर ऐसा जरूर लगता है कि यहाँ बैनर-पोस्टर लगाने की किसी छिपे हुए मुकाबले (Competition) की आंधी चल रही है। गणेशोत्सव के इस पावन पर्व पर पूरे मलाड का नजारा ऐसा हो चुका है कि यहाँ की सड़कें और फ्लाईओवर कम, नेताओं के होर्डिंग बोर्ड ज्यादा नजर आते हैं। इस अंधाधुंध बैनरबाजी के खेल ने स्थानीय प्रशासन और बीएमसी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बैनरबाजी की जंग: असलम शेख बनाम तेजिंदर तिवाना
- कंचपाड़ा सिग्नल से न्यू लिंक रोड तक कब्जा: अगर आप कंचपाड़ा सिग्नल से न्यू लिंक रोड की तरफ बढ़ेंगे, तो पाएंगे कि बीजेपी के नेता तेजिंदर तिवाना के बैनरों की लंबी कतार से पूरा इलाका ढका हुआ है।
- मिथ चौकी फ्लाईओवर पर दबदबा: वहीं दूसरी ओर, कांग्रेस विधायक असलम शेख बैनरबाजी के इस खेल के सबसे मंजे हुए खिलाड़ी माने जाते हैं। उन्हें अच्छी तरह पता है कि उनके रुतबे के आगे कोई आसानी से बोलने की हिम्मत नहीं करता। यही वजह है कि मिठ चौकी सिग्नल पर बने फ्लाईओवर (Bridge) पर पूरी तरह कब्जा करके लोहे के तारों से बांधकर बड़े-बड़े बैनर लटका दिए गए हैं।
- तिवाना का पलटवार: प्रतिद्वंद्विता में पीछे न रहते हुए, तेजिंदर तिवाना ने भी फ्लाईओवर के दूसरी तरफ अपने बैनर टांग दिए हैं।
बीएमसी की आँखें बंद और जनता का सवाल: जब बिना विकास के जीत पक्की है, तो मेहनत क्यों?
शायद इन नेताओं को अच्छी तरह यह बात समझ आ चुकी है कि जब बिना कोई ठोस विकास किए भी चुनाव जीते जा सकते हैं, तो फिर विकास के कामों में अपना वक्त क्यों बर्बाद किया जाए? इससे बेहतर तरीका यह है कि जगह-जगह बैनर टांग दिए जाएं ताकि जनता को यह अहसास कराया जा सके कि उनके पीछे भारी जनसमूह खड़ा है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन अवैध और खतरनाक बैनरों पर बीएमसी की नजर नहीं पड़ती?
सहायक आयुक्त कुंदन रा. वळवी की छत्रछाया या खुली छूट?
बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के पी/उत्तर (P/North) वॉर्ड की कमान संभाल रहे सहायक आयुक्त कुंदन रा. वळवी (Kundan R. Valvi) के कार्यक्षेत्र में यह सब कुछ खुलेआम चल रहा है। जब नेताओं और बीएमसी प्रमुख के बीच गहरी दोस्ती और साठगांठ हो, तो फिर नियमों की परवाह कौन करे? चाहे सिग्नल पर बैनर लगे हों या फ्लाईओवर की रैलिंग्स पर, बीएमसी अधिकारियों को इससे क्या लेना-देना?
स्थिति यह है कि सिस्टम में बैठे किसी मंत्री या अधिकारी में इतनी हिम्मत नहीं है कि वे कुंदन रा. वळवी के कामकाज पर सवाल उठा सकें। यही वजह है कि कुंदन रा. वळवी के संरक्षण में मलाड का यह इलाका नेताओं की बैनरबाजी का अखाड़ा बन चुका है, और उन्हें जो मन में आता है, वे बेधड़क कर रहे हैं। ‘वशिष्ठ वाणी’ की इस विशेष पड़ताल में प्रशासनिक और राजनीतिक इस गठजोड़ को बेनकाब किया जा रहा है, ताकि जनता जान सके कि उनके शहर को किस तरह गर्त में धकेला जा रहा है।









