मुंबई | मालाड (पश्चिम) | खोजी पॉलिटिकल रिपोर्ट
अगर आप सोचते हैं कि प्रशासनिक अधिकारी सिर्फ फिल्मों में ही विलेन या नेताओं के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली होते हैं, तो ठहरिए! मुंबई के गोरेगांव में तैनात डिप्टी कलेक्टर (उपजिलाधिकारी) विनायक पाडवी की यह ‘सच्ची और फिल्मी’ कहानी आपके होश उड़ा देगी। कहानी में एक्शन है, ड्रामा है, एक लाचार महिला की बेबसी है, और सबसे बढ़कर—नेताओं के आगे घुटने टेकने वाले एक ‘रीढ़विहीन’ सिस्टम का कड़वा सच है।
पहला दृश्य: “आज ही तोड़ दूंगा दीवार, बीएमसी का हथौड़ा चलेगा!”

मामला मालाड पश्चिम के एरंगळ विलेज (योगाश्रम, बुल्लर गार्डन, दाणापाणी, पिन-400061) का है। जहाँ पीड़ित महिला अधिकारी नेहा निलेश वालावलकर अपने ही घर के रास्ते (राइट टू वे) के लिए वर्षों से गुहार लगा रही थीं। दबंगों ने रास्ता ऐसा ब्लॉक किया कि उन्हें एक साल किराए के घर में भटकना पड़ा।
जैसे ही इस मुद्दे पर ‘वशिष्ठ वाणी’ ने खबर प्रकाशित की, हमारे डिप्टी कलेक्टर विनायक पाडवी साहब अचानक ‘सिंघम’ के अवतार में आ गए। उन्होंने जोश-जोश में ‘वशिष्ठ वाणी’ से कहा— “आज ही फैसला कर देता हूँ! बीएमसी के लोग हथौड़ा लेकर आ रहे हैं, आज ही रास्ता खुलेगा।” साहब लाव-लश्कर और हाथ में हथौड़ा लेकर मौके पर मुआयना करने पहुंच भी गए। जनता तालियां बजाने ही वाली थी कि… तभी कहानी में असली ‘ट्विस्ट’ आया!
दूसरा दृश्य: बजी मोबाइल की घंटी और ‘सिंघम’ बन गए ‘भीगी बिल्ली’!
सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के मुताबिक, जब कार्रवाई शुरू होने ही वाली थी, तभी साहब के मोबाइल की घंटी बजी। फोन स्क्रीन पर चमका एक बड़ा नाम—कहा जा रहा है कि वह फोन स्थानीय विधायक (MLA) असलम शेख या उनके सुपुत्र का था! फोन पर उधर से कड़क आवाज आई और इधर पाडवी साहब का सारा ‘सिंघम’ अवतार काफूर हो गया।
कार्रवाई करने गए साहब अचानक गायब होने के बहाने ढूंढने लगे। जब ‘वशिष्ठ वाणी’ की टीम ने पूछा कि साहब, हथौड़ा चलते-चलते क्यों रुक गया? तो साहब ने ऐसा बहाना बनाया जिसे सुनकर ‘ऑस्कर अवॉर्ड’ भी शरमा जाए! साहब बोले— “अरे, मानसून (बरसात) का समय है, हम अभी कार्रवाई नहीं कर सकते।”
‘वशिष्ठ वाणी’ का तीखा सवाल: साहब, जब आप हाथ में हथौड़ा लेकर घर से निकले थे, तब क्या आसमान में धूप खिली थी? और रास्ते की अवैध दीवार तोड़ने के लिए मानसून के बहाने की क्या जरूरत? आप किसी का आशियाना नहीं उजाड़ रहे थे, बल्कि एक पीड़ित महिला का रास्ता खोल रहे थे!
तीसरा दृश्य: 2 दिन की मोहलत और 4 दिन का सन्नाटा
जब मानसून का बहाना नहीं चला, तो पलटू राम पाडवी साहब ने नया पैंतरा फेंका— “दबंगों को 2 दिन का अल्टीमेटम दिया है, अगर वो खुद दीवार नहीं हटाएंगे तो हमारी टीम तोड़ेगी।” लेकिन एरंगळ के स्थानीय लोगों ने ‘वशिष्ठ वाणी’ को पहले ही बता दिया था कि— “साहब को ऊपर से फोन आ चुका है, अब वो कुछ नहीं करेंगे।”
हुआ भी यही। 2 दिन की मोहलत बीत गई, 4 दिन बीत गए, न दीवार टूटी, न रास्ता खुला। दबंग मजे से हंस रहे थे और कानून का इकबाल गोरेगांव कलेक्टर ऑफिस की फाइलों में दम तोड़ रहा था।
क्लाइमेक्स: “कार्रवाई भी होगी और सबूत भी भेजूंगा”… और फिर कर दिया ‘BLOCK’!
हद तो तब हो गई जब कुछ दिनों बाद दोबारा बात होने पर पाडवी साहब ने फिर अपनी ‘ईमानदारी’ का चोला ओढ़ा और ‘वशिष्ठ वाणी’ से वादा किया— “आज चाहे जो हो जाए, कार्रवाई होगी और मैं खुद आपको सबूत (तस्वीरें) व्हाट्सएप पर भेजूंगा।” ‘वशिष्ठ वाणी’ की टीम को लगा कि शायद अधिकारी का जमीर जाग गया है और कार्रवाई के बाद हम इनका सम्मान करेंगे। लेकिन साहब ने तो ‘महा-क्लाइमेक्स’ रच दिया! कार्रवाई का सबूत भेजने के बजाय डिप्टी कलेक्टर विनायक पाडवी ने ‘वशिष्ठ वाणी’ के ऑफिशियल नंबर को ही व्हाट्सएप पर ब्लॉक (Block) कर दिया!
मुंह छिपाते फिर रहे हैं साहब; जनता पूछ रही है सवाल!
नंबर ब्लॉक करने के बाद ‘वशिष्ठ वाणी’ की टीम लगातार कॉल करती रही, लेकिन साहब फोन उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में, जहाँ कानून का राज होने का दावा किया जाता है, वहाँ एक जिम्मेदार डिप्टी कलेक्टर का मीडिया के सवालों से मुंह छिपाना और सच से भागना बेहद शर्मनाक है।
‘वशिष्ठ वाणी’ का खुला चैलेंज:
विनायक पाडवी, नंबर ब्लॉक करने से सच ब्लॉक नहीं होता! एक लाचार महिला के हक को राजनेताओं के पैरों में गिरवी रखने का यह खेल अब बेनकाब हो चुका है। ‘वशिष्ठ वाणी’ इस राजनीतिक और प्रशासनिक सांठगांठ के खिलाफ तब तक लिखती रहेगी, जब तक नेहा वालावलकर को उनका रास्ता नहीं मिल जाता और आपकी इस ‘कागजी बहादुरी’ का पूरा सच मुंबई की जनता के सामने नहीं आ जाता!









