मुंबई | जनकल्याण नगर | जनहित में जारी खोजी रिपोर्ट
सावधान! सतर्क रहिए! अगर आप मुंबई के चारकोप पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में रहते हैं, और यह मुगालता पाले बैठे हैं कि कोई मुसीबत आने पर खाकी वर्दी आपकी मदद के लिए दौड़ी चली आएगी… तो अपनी इस गलतफहमी को तुरंत दूर कर लीजिए। खासकर तब, जब आपकी लड़ाई किसी रसूखदार बिल्डर से हो!
क्योंकि यहाँ कानून का डंडा जनता पर तो चल सकता है, लेकिन बिल्डरों के आगे वह ‘सरेंडर’ मोड में आ जाता है। अगर आपको यकीन नहीं हो रहा, तो ‘वशिष्ठ वाणी’ का यह ताजा महा-खुलासा आंखें खोलने के लिए काफी है।
आधी रात के 2 बजे… जब ‘सिंघम’ की जगह ‘सेटिंग’ जागती है!
मामला मालाड के जनकल्याण नगर का है, जहाँ डोटोम (Dotom) डेवलपर का एक आलीशान प्रोजेक्ट चल रहा है। नियम-कानून कहते हैं कि रात के सन्नाटे में भारी मशीनों का तांडव नहीं हो सकता। लेकिन साहब, यह ‘नया दौर’ है!
रात के ठीक 2 बजे जब पूरा इलाका सो रहा था, तब डोटोम डेवलपर की भारी-भरकम मशीनें दहाड़ रही थीं। पिलर और सीलिंग (Ceiling) का काम इस कदर चालू था मानो दिन का उजाला हो। एक त्रस्त नागरिक ने हिम्मत दिखाई और मुंबई पुलिस के आपातकालीन नंबर ‘100’ पर मदद की गुहार लगाई। कंट्रोल रूम ने कहा— “फिक्र मत कीजिए, चारकोप पुलिस की गाड़ी आ रही है।”
वीडियो सबूत देखकर भी पुलिस को मोतियाबिंद! सुबह के 4 बज गए पर नहीं आई गाड़ी
अब आप सोच रहे होंगे कि पुलिस आई होगी और काम रुक गया होगा? जी नहीं! यहीं तो असली खेल शुरू होता है। मशीनों की घड़घड़ाहट और सीमेंट कंक्रीट का काम बदस्तूर जारी रहा। रात के 2 से 3 बजे, और फिर सुबह के 4 बज गए… लेकिन चारकोप पुलिस की पीसीआर वैन को जनकल्याण नगर का रास्ता नसीब नहीं हुआ।
‘वशिष्ठ वाणी’ का सीधा प्रहार: पुलिस भला आती भी कैसे? अगर पुलिस ऐन वक्त पर पहुँच जाती, तो सीमेंट से जो सीलिंग का काम चल रहा था, वह बीच में ही रुक जाता। इससे डोटोम डेवलपर का लाखों रुपये का भारी नुकसान हो जाता! अब आप ही बताइए, जब बिल्डर साहब पुलिस के ‘लंगोटिया यार’ बन जाएं, तो पुलिस अपने जिगरी दोस्त का नुकसान कैसे बर्दाश्त कर सकती है? आखिर दोस्ती भी तो निभानी है ना साहब!
जब सुबह पुलिस से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से सफेद झूठ बोल दिया कि— “हमारी गाड़ी गई थी, पर वहां कोई काम नहीं चल रहा था।” अब ‘वशिष्ठ वाणी’ के पास मौजूद यह लाइव वीडियो देख लीजिए, जिसमें मशीनें चीख-चीखकर पुलिस के झूठ की गवाही दे रही हैं।
सीपी (CP) साहब से शिकायत? भूलकर भी मत सोचना!
अब आम जनता के दिमाग में एक और मासूम ख्याल आता है— “चलो, चारकोप पुलिस बिक गई तो क्या हुआ, हम मुंबई पुलिस कमिश्नर (CP) से शिकायत करेंगे!” ‘वशिष्ठ वाणी’ आपको मुफ्त की सलाह देता है कि ऐसी गलती कभी मत करना! क्योंकि इस नए दौर में आप चाहे कमिश्नर साहब को चिट्ठी लिखें या ट्विटर पर टैग करें, नीचे बैठे साहबान अपनी आंखें, कान और जमीर सब बंद कर लेंगे। जब रसूख और पैसे का पहिया घूमता है, तो बड़े-बड़े कड़क आदेश फाइलों के नीचे दबकर दम तोड़ देते हैं।
निष्कर्ष: रक्षक ही जब भक्षक के यार बन जाएं…
जिस मुंबई पुलिस की मुस्तैदी की कसमें खाई जाती थीं, जिसके दम पर आम मुंबईकर खुद को सुरक्षित महसूस करता था, आज उसी पुलिस का एक हिस्सा बिल्डरों की चौखट पर मुजरा कर रहा है।
चारकोप पुलिस से ‘वशिष्ठ वाणी’ का कड़क सवाल:
साहब, अगर रात भर बिल्डरों को खुली छूट देनी है और जनता की शिकायतों को कचरे के डिब्बे में फेंकना है, तो ‘100 नंबर’ की इस नौटंकी को बंद क्यों नहीं कर देते? साफ-साफ बोर्ड लगा दीजिए कि— “यहाँ सिर्फ बिल्डरों की सुनवाई होती है, आम जनता परेशान न करे!” शर्मनाक है यह साठगांठ, जिसे जनता बहुत करीब से देख रही है!











