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विशेष रिपोर्ट: ‘ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा’ का क्या हुआ? राम मंदिर के चढ़ावे और पीएम मोदी के मौन पर उठे सवाल

अयोध्या/मुंबई: देश की राजनीति में एक बार फिर भ्रष्टाचार के आरोपों और सत्ता के शीर्ष की चुप्पी पर बहस तेज हो गई है। हाल के महीनों में हुई कुछ घटनाओं ने आम जनता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘जीरो टॉलरेंस’ का नारा अब केवल एक राजनीतिक जुमला बनकर रह गया है?

‘ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा’—प्रधानमंत्री मोदी के नारे का क्या हुआ?

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभाली थी, तब ‘ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा’ का संकल्प देश के लिए भ्रष्टाचार मुक्ति की एक बड़ी उम्मीद बना था। लेकिन आज, जब राम मंदिर जैसे श्रद्धा के केंद्र में दान और प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, तो जनता का यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी का यह संकल्प केवल चुनावी जुमला था?

राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी: प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी पर सवाल

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे (दान) की चोरी के आरोपों ने पूरे भारत को शर्मसार कर दिया है। जिन लोगों ने राम मंदिर निर्माण का श्रेय लेने के लिए विपक्ष और अन्य सभी को दरकिनार कर दिया था, आज मंदिर परिसर में हुई इस बड़ी धांधली पर प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े करती है:

  • क्या यह अहंकार है? क्या प्रधानमंत्री मोदी को यह लगता है कि सत्ता के अहंकार में उन्हें अब जनता को जवाब देने की जरूरत नहीं है?
  • क्या जनता की याददाश्त पर भरोसा है? क्या सरकार को यह भली-भांति पता है कि जनता का गुस्सा अभी उबल रहा है, लेकिन कुछ दिनों बाद वे सब भूल जाएंगे?
  • दोषियों को संरक्षण? राम मंदिर के इस कांड में दोषियों को सजा दिलाने के बजाय दोषियों को बचाने की कोशिशें हो रही हैं। देश की नजरें प्रधानमंत्री मोदी पर हैं, लेकिन उनके मुंह से एक शब्द भी न निकलना प्रशासन और व्यवस्था के प्रति भरोसे को तोड़ रहा है।

मध्य प्रदेश भूमि घोटाला और प्रशासनिक शिथिलता

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव के कार्यकाल के दौरान भूमि घोटाले के खुलासे ने भी सरकार की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जब प्रिंट मीडिया और अन्य माध्यमों ने सबूतों के साथ भ्रष्टाचार को उजागर किया, तो प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से कोई ठोस कदम न उठाया जाना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अब केवल फाइलों तक सीमित है।

निष्कर्ष: जवाबदेही की प्रतीक्षा

‘ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा’ का नारा आज जनता के बीच उपहास का विषय बन गया है। राम मंदिर में हुई इतनी बड़ी घटना के बाद प्रधानमंत्री मोदी का मौन रखना यह साबित करता है कि क्या यह सरकार केवल श्रेय लेने में विश्वास रखती है या घोटालों और भ्रष्टाचार पर कार्यवाही में भी?

भारत की जनता आज प्रधानमंत्री मोदी से जवाब मांग रही है। यदि सरकार इन गंभीर मुद्दों पर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ती और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित नहीं करती, तो यह न केवल देश की आस्था के साथ खिलवाड़ होगा, बल्कि यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि ‘ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा’ वास्तव में क्या था?

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