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एक वर्ष बाद भी कार्रवाई नहीं: मालवणी पुलिस की अधिकारी अमृता देशमुख और PSI प्रफुल पर कब होगा एक्शन?

मुंबई । वशिष्ठ वाणीविशेष रिपोर्ट

एक समय था जब पुलिस के खिलाफ कोई भी शिकायत सामने आते ही वरिष्ठ अधिकारी तुरंत संज्ञान लेते थे और जांच के आदेश जारी हो जाते थे। लेकिन मौजूदा हालात को देखकर यह सवाल उठने लगा है कि क्या अब ऐसे मामलों को पहले जैसी गंभीरता से लिया जा रहा है या नहीं।

मालवणी पुलिस थाने से जुड़ा एक मामला पिछले एक वर्ष से अधिक समय से चर्चा में है, लेकिन अब तक किसी भी अधिकारी की ओर से न तो स्पष्ट जवाब सामने आया है और न ही कोई ठोस कार्रवाई दिखाई दी है।

आरोप है कि मालवणी पुलिस की अधिकारी अमृता देशमुख और PSI प्रफुल ने एक साधारण NC (नॉन-कॉग्निज़ेबल शिकायत) दर्ज करने में लगभग तीन महीने का समय लगा दिया।


सबूत: दस्तावेज़ों से सामने आई तारीखों की सच्चाई

मामले से जुड़े उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार दो अलग-अलग पत्र सामने आए हैं—एक बीएमसी अधिकारी का और दूसरा मालवणी पुलिस की अधिकारी अमृता देशमुख का।

दस्तावेज़ों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि:

  • बीएमसी के अधिकारी द्वारा 11 जनवरी 2025 को मालवणी पुलिस को लिखित शिकायत भेजी गई थी।
  • इसके बाद भी मामले में तत्काल कार्रवाई नहीं हुई।
  • उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार मालवणी पुलिस की अधिकारी अमृता देशमुख द्वारा 28 मार्च 2025 को NC (नॉन-कॉग्निज़ेबल) दर्ज की गई।

इन दोनों तारीखों के बीच लगभग ढाई से तीन महीने का अंतर दिखाई देता है।

इसी देरी को लेकर अब सवाल उठाए जा रहे हैं कि जब 11 जनवरी 2025 को बीएमसी की ओर से लिखित शिकायत मालवणी पुलिस को भेज दी गई थी, तो फिर NC दर्ज करने में 28 मार्च 2025 तक का समय क्यों लगा?

यही वह मुख्य बिंदु है जिस पर अब तक कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है और इसी वजह से मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।


क्या है पूरा मामला

मालवणी गेट नंबर 8, सामना नगर क्षेत्र में दीवार निर्माण के दौरान कथित रूप से एक पेड़ की जड़ों को काटे जाने का मामला सामने आया था।

इस घटना की जानकारी मिलने पर समाजसेवी और पर्यावरण प्रेमी सम्राट बागुल ने BMC में लिखित शिकायत दर्ज कराई।

बताया जाता है कि बीएमसी द्वारा जांच के बाद इस मामले की जानकारी लिखित रूप से मालवणी पुलिस को भी भेजी गई। आरोप है कि इसके बावजूद पुलिस द्वारा NC दर्ज करने में करीब तीन महीने की देरी हुई, जिससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे।


सवाल पूछने पर विवाद

सूत्रों के अनुसार जब इस देरी को लेकर अधिकारी अमृता देशमुख से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने संतोषजनक जवाब देने के बजाय नाराज़गी जाहिर की।

बाद में जब यह मामला मीडिया में उठा तो अलग-अलग तरह के स्पष्टीकरण सामने आए, लेकिन सबसे अहम सवाल—तीन महीने की देरी क्यों हुई—का स्पष्ट जवाब अब तक सामने नहीं आया।


कानूनी नोटिस भी भेजा गया

इस विषय को लेकर मीडिया की लीगल टीम के सलाहकार ओम प्रकाश मिश्रा द्वारा मुंबई पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को कानूनी नोटिस भी भेजा गया।

इसके अलावा शिकायतकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता सम्राट बागुल ने बोरीवली के डीसीपी कार्यालय में जाकर भी इस मामले की शिकायत दर्ज कराई।

बताया जाता है कि डीसीपी स्तर पर आश्वासन दिया गया था कि मामले में जल्द कार्रवाई होगी, लेकिन कई महीने बीत जाने के बाद भी कोई ठोस कदम सामने नहीं आया।


वरिष्ठ अधिकारियों पर भी उठे सवाल

इस पूरे मामले में यह सवाल भी उठ रहा है कि मालवणी पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी शैलेंद्र नागरकर ने अब तक इस विषय पर क्या कदम उठाया है।

आरोप है कि इतने गंभीर सवालों के बावजूद अब तक न तो कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण आया है और न ही संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है।


कानून क्या कहता है

कानून के अनुसार यदि कोई व्यक्ति पुलिस के पास शिकायत लेकर आता है, तो पुलिस को तुरंत NC दर्ज करना आवश्यक होता है।

ऐसे में तीन महीने की देरी को लेकर कानूनी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर सवाल उठ रहे हैं।


राष्ट्रीय मीडिया का आरोप

राष्ट्रीय मीडिया Vashishtha Vani का यह भी आरोप है कि जब इस विषय पर लगातार सवाल उठाए गए, तो कथित तौर पर उनका संपर्क तक ब्लॉक कर दिया गया। इससे यह धारणा और मजबूत होती है कि मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया।


मुख्य सवाल जो अब भी अनुत्तरित हैं

  • मालवणी पुलिस की अधिकारी अमृता देशमुख और PSI प्रफुल पर कार्रवाई कब होगी?
  • क्या किसी अधिकारी को यह अधिकार है कि वह अपनी सुविधा के अनुसार NC दर्ज करे?
  • यदि देरी साबित हो चुकी है, तो अब तक निलंबन या विभागीय जांच क्यों नहीं हुई?
  • क्या इस मामले में किसी प्रकार का प्रशासनिक दबाव काम कर रहा है?

पुलिस मुख्यालय तक उम्मीद

सूत्रों के अनुसार मुंबई पुलिस मुख्यालय में पुलिस आयुक्त प्रतिदिन जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं की समस्याएँ सुनते हैं। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि यदि यह मामला उच्च स्तर तक पहुँचता है तो इस पर संज्ञान लिया जा सकता है।


एक साधारण NC दर्ज करने में तीन महीने की देरी और उसके बाद एक वर्ष से अधिक समय तक कार्रवाई का अभाव—ये दोनों बातें मिलकर पुलिस व्यवस्था की जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती हैं।

अब देखना यह होगा कि मुंबई पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी इस मामले को कब गंभीरता से लेते हैं और क्या संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई होती है या नहीं।

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