मुंबई (विशेष प्रतिनिधि): मालाड (पश्चिम) के दाणापाणी, एरंगळ विलेज स्थित बुल्लर गार्डन, योगाश्रम का यह मामला अब सरकारी संवेदनहीनता और अधिकारियों की तानाशाही का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है। पिछले कई महीनों से अपने ही घर से बाहर निकलने के बुनियादी हक (राइट टू वे) के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही पीड़ित महिला नेहा निलेश वालावलकर को इंसाफ देने के नाम पर कलेक्ट्रेट से आए अधिकारियों ने जो ‘तमाशा’ किया है, उसने कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पीछे के दरवाजे से ‘रास्ते का खेल’: कब्जाधारियों के आगे झुके अधिकारी!
कलेक्टर कार्यालय से आए अधिकारी उमेश चौधरी ने मौके पर पहुंचकर पीड़िता को जो रास्ता दिया, उसकी असलियत तस्वीरों में साफ देखी जा सकती है।
- मुख्य रास्ते से अवैध निर्माण हटाने के बजाय, अधिकारी ने पीछे के दरवाजे से एक ऐसा संकरा रास्ता थमा दिया, जिससे घर का जरूरी सामान तक अंदर जाना नामुमकिन है।
- सबसे शर्मनाक बात यह रही कि जिसने सरकारी जगह पर अवैध कब्जा किया है, उसके सामने हाथ-पैर जोड़कर यह रास्ता निकाला गया।
जब पीड़िता नेहा निलेश वालावलकर ने अधिकारी उमेश चौधरी से सीधा और तीखा सवाल पूछा कि— “जो हमारा मुख्य रास्ता है, आप वहां से अवैध दीवार क्यों नहीं हटाते?” तो अधिकारी ने एक ऐसा अजीबोगरीब बहाना बनाया जिसे सुनकर कानून भी अपना सिर पकड़ ले।
“दीवार तोड़ी तो महिला आत्महत्या कर लेगी”— अधिकारी का नया बहाना
अधिकारी उमेश चौधरी का कहना है कि वहां रहने वाली एक अन्य महिला ने धमकी दी है कि अगर दीवार तोड़ी गई, तो वह खुदकुशी कर लेगी।
वशिष्ठ वाणी का सीधा सवाल: > 1. कल को जब आप किसी बड़े अवैध निर्माण को बुल्डोजर से ध्वस्त करने जाएंगे और वहां कोई आरोपी कहेगा कि मैं खुदकुशी कर लूंगा, तो क्या प्रशासन घुटने टेक देगा?
2. अधिकारी महोदय, अगर कोई आपके खुद के घर के बाहर अवैध दीवार खड़ी कर दे और कहे कि इसे तोड़ा तो मैं जान दे दूंगा, तो क्या आप अपना घर छोड़ देंगे?
साफ है कि अधिकारी किसी राजनीतिक नेता या ऊपर के दबाव में आकर कार्रवाई करने से बच रहे हैं, और अपनी कमजोरी को छुपाने के लिए ऐसे बहानों का सहारा ले रहे हैं। इससे पहले डिप्टी कलेक्टर (उपजिलाधिकारी) विनायक पाडवी भी रास्ता देने के बजाय अलग ही खेल खेल चुके हैं। इन अधिकारियों को न तो कानून का डर है और न ही अपनी वर्दी की शर्म।
सच बोलने पर न्याय की जगह मिली धमकी: “तुम्हारा घर भी तोड़ दूंगा”
हद तो तब हो गई जब पीड़ित नेहा वालावलकर ने इस ढुलमुल कार्रवाई पर कड़े सवाल दागे। सवाल सुनते ही अधिकारी उमेश चौधरी अपना आपा खो बैठे और पीड़िता को ही धमकाना शुरू कर दिया। अधिकारी ने सरेआम कहा:
“जो रास्ता मिला है वो चुपचाप ले लो, वरना यह भी लॉक कर दूंगा और सभी के साथ तुम्हारा भी घर तोड़ दूंगा!”
जो पीड़ित एक साल से इंसाफ के लिए भटक रहा है, उसे न्याय देने और दबंगों पर कार्रवाई करने के बजाय, सरकारी अधिकारी खुद दबंग की भूमिका में आ गए हैं। कानूनन अधिकार मांगने पर घर तोड़ने की धमकी देना सीधे तौर पर पद का दुरुपयोग और मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
वशिष्ठ वाणी के सुलगते सवाल:
- क्या मुंबई में अब कानून का राज खत्म हो चुका है और कलेक्ट्रेट के अधिकारी सिर्फ दबंगों और रसूखदारों के लिए काम कर रहे हैं?
- मुंबई पुलिस कमिश्नर और जिला कलेक्टर ऐसे तानाशाह अधिकारी उमेश चौधरी पर संज्ञान लेकर कार्रवाई कब करेंगे?
जनता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि इस तानाशाही के खिलाफ ठोस जमीनी कार्रवाई देखना चाहती है।










