लोकप्रिय विषयमहाराष्ट्रसम्पादकीयकवितास्वास्थ्यअपराधअन्यवीडियो

वशिष्ठ वाणी विशेष: लोकतंत्र में ‘सवाल’ पूछना हक है, तो फिर इसे ‘महाराष्ट्र का अपमान’ क्यों बताया जा रहा है?

  • ब्यूरो रिपोर्ट, वशिष्ठ वाणी:

महाराष्ट्र के हजारों करोड़ रुपये के बुनियादी ढांचा (Infrastructure) प्रोजेक्ट्स की गुणवत्ता पर उठे सवालों ने अब राज्य में एक नई और गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के ‘मिसिंग लिंक’ प्रोजेक्ट में आई तकनीकी खामियों के बाद जब सोशल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों (Youtubers) ने सरकार को घेरा, तो विधानसभा के भीतर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का एक बेहद तीखा बयान सामने आया। मुख्यमंत्री ने आलोचना करने वालों के लिए ‘भाड़े के टट्टू’ जैसे कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए इसे सीधे ‘महाराष्ट्र को बदनाम करने की साजिश’ करार दे दिया।

मुख्यमंत्री के इस रुख के बाद ‘वशिष्ठ वाणी’ कुछ बेहद बुनियादी और कड़े सवाल उठा रही है, जो आज हर सजग नागरिक के मन में हैं:

1. मर्यादा की कसौटी: जनता के लिए अलग और नेताओं के लिए अलग क्यों?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि लोकतंत्र में जब भी कोई नागरिक, पत्रकार या यूट्यूबर सरकार से सवाल पूछे, तो उसकी भाषा पूरी तरह मर्यादित, शालीन और तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। अभद्र भाषा का समर्थन कोई नहीं कर सकता। लेकिन, क्या यही नियम सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए लागू नहीं होता? विधानसभा जैसे लोकतंत्र के सबसे पवित्र मंदिर से सूबे के मुख्यमंत्री द्वारा ‘भाड़े के टट्टू’ जैसे शब्दों का प्रयोग करना क्या संसदीय मर्यादा को शोभा देता है?

2. सवाल पूछना ‘अधिकार’ है या ‘अहंकार’ के आगे सरेंडर?

जब जनता के खून-पसीने की कमाई (Tax) से बने प्रोजेक्ट्स पहली ही बारिश में जवाब दे जाते हैं, तो जवाबदेही तय करने के बजाय सवाल उठाने वालों की नीयत पर शक करना कहाँ तक सही है? आलोचकों को सीधे ‘बिकाऊ या पेड’ कह देना कहीं न कहीं सत्ता के उस अहंकार को दर्शाता है जो आलोचना सुनने का धैर्य खो चुका है। लोकतंत्र में सरकारें जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं, इसलिए चाहे आम नागरिक हो या यूट्यूबर—सवाल पूछना उसका संवैधानिक धर्म है।

3. छत्रपति शिवाजी महाराज की भूमि का अपमान कोई नहीं कर सकता!

सबसे महत्वपूर्ण बात, जो हर राजनेता को समझनी होगी—महाराष्ट्र का गौरव और इसकी अस्मिता किसी एक सरकार, नेता या पार्टी की बपौती नहीं है। छत्रपति शिवाजी महाराज की यह पावन धरा इतनी महान है कि कोई भी व्यक्ति या कोई भी आलोचना इसका अपमान नहीं कर सकती। अपनी प्रशासनिक नाकामियों, खराब कंस्ट्रक्शन क्वालिटी और ठेकेदारों की लापरवाही को छिपाने के लिए हर सवाल को ‘महाराष्ट्र का अपमान’ बता देना, असल मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने की एक बेहद गंदी राजनीतिक रणनीति है।

‘वशिष्ठ वाणी’ का स्पष्ट संदेश:

लोकतंत्र का स्तर तभी सुधरेगा जब सत्ता में बैठे लोग तीखे सवालों से भागने या अहंकारी भाषा का उपयोग करने के बजाय, पूरी विनम्रता से जनता को सच और समाधान बताएंगे। सवाल पूछना महाराष्ट्र का अपमान नहीं, बल्कि लोकतंत्र को जीवित रखने की सबसे बड़ी ताकत है।

Join WhatsApp

Join Now

और पढ़ें

‘वशिष्ठ वाणी’ महा-अभियान: नाम बड़ा और दर्शन छोटे! मालाड में VIBGYOR स्कूल की बसों ने मुख्य सड़क को बनाया ‘निजी पार्किंग’; गोरेगांव ट्रैफिक विभाग और RTO को खुली चुनौती, आखिर किसने दी अनुमति?

श्री संवतिलाल खंडवाला मार्ग रोड पर अवैध पार्किंग का ‘साम्राज्य’; आधा रास्ता बंद होने से रोज़ लग रहा भीषण जाम, कहाँ सोया है ट्रैफिक विभाग?

बारिश ने खोली पोल: मालाड के जनकल्याण नगर में गड्ढा भरने के बजाय बीएमसी ने खड़ा किया तमाशा, ३ दिन से जनता राम भरोसे!

‘वशिष्ठ वाणी’ महा-खुलासा: राम मंदिर महा-चोरी के बाद ट्रस्टियों में मची भगदड़; चंपत राय-अनिल मिश्रा का इस्तीफा, कोषाध्यक्ष की ‘लेटर पॉलिटिक्स’ पर खड़े हुए १० तीखे सवाल!

‘वशिष्ठ वाणी’ विशेष पड़ताल: राम मंदिर में ‘आस्था की डकैती’ और SIT का कानूनी ढोंग; दागी ट्रस्टियों के आगे नतमस्तक हुआ तंत्र, जागो राम भक्तों जागो!

विशेष: नेताओं के ‘गुलाम’ और मीडिया के लिए ‘बहरे’ हुए अफ़सर; क्या ‘वशिष्ठ वाणी’ के खुलासे भी अफ़सरशाही के लिए सिर्फ रद्दी कागज़ हैं?

Leave a Comment