सवालों के घेरे में ‘चौकीदार’ का दावा: करोड़ों राम भक्तों की गाढ़ी कमाई के चढ़ावे पर डाका, फिर भी शीर्ष नेतृत्व का रहस्यमयी मौन।
ब्यूरो, मुंबई (वशिष्ठ वाणी):
“जो राम को लाए हैं, हम उनको लाएंगे”—इस गगनभेदी नारे की आड़ में सत्ता के शीर्ष सिंहासन तक पहुँचने वाले सिपहसालार आज आस्था के सबसे बड़े केंद्र में हुई ‘डकैती’ पर धृतराष्ट्र की तरह आंखें मूंदे बैठे हैं। अयोध्या के भव्य राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा पूरी श्रद्धा से चढ़ाए गए चढ़ावे में हुई चोरी के महा-खुलासे पर ‘वशिष्ठ वाणी’ लगातार देश को सचेत कर रही है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने आज देश के सामने एक ऐसा यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है, जिसने अफ़सरशाही, राजनीति और न्याय व्यवस्था के ‘नेक्सस’ (गठबंधन) को बेनकाब कर दिया है।
सच्चाई यह है कि जिस देश में प्रधानमंत्री खुद को जनता का ‘चौकीदार’ कहते हों, उसी देश में रामलला के दरबार में सरेआम करोड़ों के चढ़ावे पर डाका डाल दिया जाता है और ‘प्रधान चौकीदार’ पूरी तरह मौन साधे हुए हैं।
‘ओ माय गॉड’ का वह कड़वा सच और सत्ता की गंदी क्रोनोलॉजी
प्रसिद्ध फिल्म ‘ओ माय गॉड’ (OMG) का वह दृश्य आज भारत की राजनीतिक हकीकत बन चुका है, जिसमें कहा गया था कि—“तुम चाहे जितनी आवाज उठा लो, धर्म एक ऐसी अफ़ीम है कि लोग कुछ समय बाद सब भूलकर उसी मंदिर के आगे लाइन में खड़े हो जाएंगे।”
सत्ता में बैठे लोग इसी ढर्रे पर काम कर रहे हैं। उन्हें पूरा भरोसा है कि जनता मूर्ख है; आज राम भक्त आक्रोशित हैं, मीडिया चिल्ला रहा है, चिल्लाने दो! ६ महीने या १ साल बीतने दो, चुनाव पास आने दो, फिर कोई नया धार्मिक एजेंडा लाया जाएगा, विपक्ष पर तीखे बाण चलाए जाएंगे और जनता इस महा-चोरी को भूलकर फिर उसी राष्ट्रवाद और धर्म के नाम पर वोट का बटन दबा देगी। क्या सनातनी हिंदुओं की आस्था और उनके स्वाभिमान को इतना सस्ता समझ लिया गया है कि उन्हें जब चाहे भावनाओं के जाल में फंसाकर लूटा जा सके?
विदेशों की सैर में व्यस्त प्रधानमंत्री, क्या राम भक्तों का दर्द गंभीर नहीं?
राम मंदिर के उद्घाटन के समय कैमरों की पूरी चमक और सारा श्रेय खुद लेने वाले प्रधानमंत्री मोदी आज इस संकट काल में देश के श्रद्धालुओं को जवाब देने के बजाय विदेशों की यात्राओं में व्यस्त हैं। क्या देश के करोड़ों राम भक्तों के विश्वास के साथ हुआ यह खिलवाड़ देश के मुखिया के लिए कोई मायने नहीं रखता?
यही हाल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का भी है, जिनपर ‘वशिष्ठ वाणी’ ने पूर्व में भी तीखे कटाक्ष किए हैं। सवाल का सीधा और पारदर्शी जवाब देने के बजाय सत्ता के अहंकार में डूबा प्रशासन सच को दबाने की कोशिश कर रहा है। आज जब कोई आम हिंदू दुनिया के सामने खड़ा होता है, तो राम मंदिर में हुई इस प्रशासनिक और ट्रस्ट की लूट के कारण पूरे हिंदू समाज का नाम बदनाम हो रहा है। रक्षक ही भक्षक की भूमिका में नजर आ रहे हैं।
एसआईटी (SIT) जांच या कानून का सरेआम मज़ाक?
इस पूरे मामले में जो सबसे बड़ा कानूनी मज़ाक किया गया है, वह है तथाकथित ‘एसआईटी’ की जांच। कानून का बुनियादी नियम कहता है कि आरोपी कभी अपनी जांच का फैसला खुद नहीं कर सकता। लेकिन यहाँ अजूबा हो रहा है—एसआईटी जिस चोरी की जांच कर रही है, उसकी गोपनीय रिपोर्ट ले जाकर उन्हीं ट्रस्टियों और अधिकारियों को सौंप रही है जिनकी पूरी टीम के ऊपर चोरी के गंभीर इल्जाम लगे हुए हैं! यह जांच है या सबूतों को रफा-दफा करने का एक सरकारी वीआईपी रास्ता (VIP Route)? जिसपर दाग है, वही जज बना बैठा है।
डर का माहौल और ईडी-सीबीआई का डर, पर ‘वशिष्ठ वाणी’ नहीं झुकेगी
आज देश में एक अघोषित डर का माहौल है। कोई भी बड़ा मीडिया घराना या संगठन सरकार के खिलाफ बोलने से कतराता है क्योंकि सबको पता है कि सत्ता का विरोध करने का मतलब है—ईडी (ED), सीबीआई (CBI) या पुलिसिया तंत्र का दुरुपयोग करके जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया जाना।
लेकिन ‘वशिष्ठ वाणी’ और ‘वशिष्ठ मीडिया हाउस’ स्पष्ट कर देना चाहता है कि हम देश के करोड़ों राम भक्तों के अपमान और सनातन धर्म की पवित्रता से खिलवाड़ को मूकदर्शक बनकर नहीं देख सकते। सत्ता चाहे जितनी शक्तिशाली हो, लेकिन सत्य और जनता की आवाज से बड़ी नहीं हो सकती। हम इस मुद्दे को तब तक उठाते रहेंगे, जब तक इस देश के ‘प्रधान’ को जनता के सामने आकर राम मंदिर की पाई-पाई का हिसाब नहीं देना पड़ता।














