लोकप्रिय विषयमहाराष्ट्रसम्पादकीयकवितास्वास्थ्यअपराधअन्यवीडियो

वशिष्ठ वाणी की पड़ताल: क्यों अब पीएम मोदी को जनता के बीच जवाबदेही की ज़रूरत महसूस नहीं होती?

नई दिल्ली: भारतीय राजनीति का चेहरा पिछले कुछ वर्षों में जिस गति से बदला है, उसने लोकतंत्र के पारंपरिक समीकरणों को हिला कर रख दिया है। आज के दौर में सत्ता के गलियारों में जो चर्चा सबसे अधिक है, वह यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनमानस की ‘नब्ज’ को पूरी तरह से पहचान लिया है?

आलोचना का प्रभावहीन होना: एक बड़ा सवाल

सोशल मीडिया का एक बड़ा वर्ग लगातार पीएम मोदी की कार्यशैली, विपक्ष को तोड़ने की रणनीति और राजनीति के गिरते स्तर पर सवाल उठा रहा है। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इस तीखी आलोचना का उनकी छवि या सत्ता की पकड़ पर कोई व्यापक असर होता दिखाई नहीं देता।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सत्ता के प्रति जो निष्ठा या विरोध का भाव पहले वैचारिक होता था, अब वह पूरी तरह से ध्रुवीकृत हो चुका है। आलोचना करने वाले अपनी आवाज को ‘सच्चाई’ मान रहे हैं, वहीं समर्थकों के लिए यह आलोचना केवल ‘शोर’ है। इस बीच, असहज करने वाली आवाजों के खिलाफ सरकारी एजेंसियों—ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग—की बढ़ती सक्रियता ने भी एक अलग संदेश दिया है, जिससे सोशल मीडिया पर एक ‘डर का माहौल’ बना है।

‘विकास’ से ‘हस्तक्षेप’ तक का सफर

एक समय था जब ‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ जैसे नारे चुनावी विमर्श का मुख्य केंद्र हुआ करते थे। आज इन नारों की जगह पूरी तरह से ‘मैनेज्ड पॉलिटिक्स’ ने ले ली है।

क्या सत्ता में बने रहने के लिए अब विमर्श (Narrative) को बदलने की आवश्यकता खत्म हो गई है? राजनीतिक विश्लेषक इसे एक नई रणनीति के रूप में देख रहे हैं:

  • संस्थाओं की भूमिका: जब प्रमुख संस्थाएं और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकार के साथ एक ही दिशा में चलता दिखता है, तब जनता के बीच जाकर सफाई देने की जरूरत स्वतः ही कम हो जाती है।
  • चुनावी गणित: विपक्षी दलों में तोड़-फोड़ और चुनावी मशीनरी पर पकड़ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आज के दौर में ‘जीत’ के लिए ‘विकास’ से अधिक ‘रणनीतिक प्रभुत्व’ को प्राथमिकता दी जा रही है।

सत्ता का नया समीकरण

यह कड़वा सच है कि आज सत्ता के लिए जो मानक तय किए गए हैं, उसमें नैतिकता और जन-आकांक्षाओं के बजाय ‘सत्ता की निरंतरता’ सर्वोपरि है। जनता के दो गुटों में बंटे होने का फायदा यह है कि सत्ता को किसी एक पक्ष की नाराजगी से अब कोई डर नहीं लगता।

क्या यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संकेत है? जब जनता का एक बड़ा हिस्सा केवल भावनाओं में बहकर अपनी निष्ठाएं चुन रहा हो और सिस्टम में सवाल पूछने वालों पर शिकंजा कसा जा रहा हो, तो यह ‘विकास’ की राजनीति के अंत और ‘पावर पॉलिटिक्स’ के उदय का स्पष्ट संकेत है।

‘वशिष्ठ वाणी’ की यह रिपोर्ट इस यक्ष प्रश्न को छोड़ती है: क्या हमने उस लोकतंत्र को खो दिया है जहाँ सत्ता को जनता के प्रति जवाबदेह होना पड़ता था, और क्या अब हम उस युग में हैं जहाँ सत्ता खुद तय करती है कि जनता को क्या सोचना चाहिए?

Join WhatsApp

Join Now

और पढ़ें

विशेष: राम मंदिर में ‘आस्था की डकैती’ पर पीएम का मौन और एसआईटी का ‘खेल’; क्या जनता को ‘शॉर्ट मेमोरी’ का गुलाम समझती है सत्ता?

राम मंदिर चढ़ावा और मध्य प्रदेश का जमीन विवाद: प्रधानमंत्री की चुप्पी पर उठे सवाल

लोकतंत्र की मर्यादा और संसदीय मूल्यों पर बढ़ता संकट: क्या हम ‘एक दलीय’ व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं?

बड़ी खबर: लोकतंत्र की मंडी? रविवार को घर बुलाकर ‘मान्यता’ का खेल!

मालाड का ‘मायावी’ नगरसेवक: जनता के मुद्दों पर ‘गायब’, पीयूष गोयल के जन्मदिन पर ‘लापता’ से ‘प्रकट’!

सत्ता मिलते ही ‘जनता’ से दूरी क्यों? @CMOMaharashtra पर आने वाली हर शिकायत की हो स्पेशल ऑडिट; ‘वशिष्ठ वाणी’ का मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को बड़ा सुझाव

Leave a Comment