वशिष्ठ वाणी स्पेशल रिपोर्ट | मुंबई
क्या भारत का लोकतंत्र अब संविधान की किताबों से नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल के ‘ऑपरेशन लोटस’ के मैनुअल से चल रहा है? यह सवाल आज हर उस नागरिक के मन में है, जो देश की संसदीय मर्यादाओं और गिरते हुए राजनीतिक स्तर को देख रहा है।
हाल ही में हुए एक घटनाक्रम ने देश को स्तब्ध कर दिया है। बंगाल में जीत का दावा करने वाली पार्टी के सामने, अचानक एक ऐसी ‘अनजान पार्टी’ खड़ी हो गई, जिसका नाम शायद ही देश के किसी कोने में सुना गया हो। और देखते ही देखते 19 सांसदों का पाला बदल दिया गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में जो सबसे बड़ा ‘संवैधानिक सवाल’ खड़ा हुआ है, वह है लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की भूमिका पर।
सवाल 1: रविवार को घर पर ‘अदालत’ क्यों लगी?
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि लोकसभा स्पीकर को रविवार के दिन अपने सरकारी आवास पर ‘दल-बदल’ करने वाले नेताओं को मान्यता देने की ऐसी क्या जल्दी थी? क्या सोमवार की सुबह का इंतज़ार करना संसदीय गरिमा के खिलाफ होता? विपक्ष, विशेषकर TMC सांसद कीर्ति आजाद द्वारा लगाए गए ‘5-5 करोड़ रुपये’ के लेनदेन के गंभीर आरोपों के बाद, स्पीकर की यह सक्रियता कई गहरे संदेह पैदा करती है।
सवाल 2: क्या संस्थाएं अब भाजपा की ‘रिमोट कंट्रोल’ हैं?
आज आम आदमी यह पूछ रहा है कि क्या देश की जांच एजेंसियां—चाहे वह ईडी (ED) हो या सीबीआई (CBI)—सिर्फ विपक्षी नेताओं को तोड़ने और दबाने का हथियार बनकर रह गई हैं? चुनाव आयोग की चुप्पी और इन एजेंसियों की चुनिंदा कार्रवाई पर उठते सवाल यह संकेत देते हैं कि लोकतंत्र के चारों स्तंभ अब एक ही दिशा में झुक रहे हैं।
सवाल 3: मोदी-शाह का ‘मास्टर प्लान’ क्या है?

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी कोई ऐसा बड़ा खेल खेलने जा रही है जिसके लिए उन्हें संसद और विधानसभाओं में हर हाल में पूर्ण बहुमत या ‘इच्छाधारी संख्या’ की दरकार है? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह जोड़-तोड़ केवल सरकार बचाने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में किसी बड़े संवैधानिक बदलाव को बिना किसी विरोध के पास कराने की तैयारी हो सकती है।
वशिष्ठ वाणी का संकल्प
वशिष्ठ वाणी को पता है कि सत्ता से सवाल पूछने का मतलब है—अखबार को दबाने की कोशिशें, धमकियां और विज्ञापन बंद होना। लेकिन हमारा उद्देश्य सिर्फ खबरें छापना नहीं, बल्कि सोई हुई जनता को जगाना है। हम उस सच को सामने लाते रहेंगे, जिसे मुख्यधारा की मीडिया ने ‘पैक’ कर दिया है।
जनता से अपील: इन दल-बदलू नेताओं के नामों की सूची तैयार रखिए। जब ये अगली बार वोट मांगने आएं, तो इन्हें लोकतंत्र की इस खरीद-फरोख्त का जवाब दें। अगर आज नहीं बोले, तो कल आपकी फरियाद सुनने वाला कोई नहीं बचेगा।











