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बड़ी खबर: ‘स्वप्नपूर्ति सोसाइटी’ में बालासाहेब भगत की तानाशाही और भ्रष्टाचार पर कोर्ट का शिकंजा, अभिषेक अनिल वशिष्ठ ने दायर की याचिका

मालाड (मालवणी): मालवणी की स्वप्नपूर्ति सोसाइटी में पिछले 15 वर्षों से कायम तानाशाही और कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ अब कानूनी शिकंजा कस गया है। वशिष्ठ मीडिया हाउस के संस्थापक और समूह समाचार पत्र के मालिक अभिषेक अनिल वशिष्ठ ने इस मामले में सीधे न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। वशिष्ठ मीडिया हाउस के कानूनी सलाहकार ओम प्रकाश मिश्रा ने पुष्टि की है कि कोर्ट द्वारा जारी समन 6 जुलाई तक संबंधित पक्षों को मिल जाएगा, जिसके बाद सोसायटी अध्यक्ष बालासाहेब भगत और MHADA के कथित सहयोगी अधिकारियों को कोर्ट में हर सवाल का जवाब देना होगा।

क्या है बालासाहेब भगत की साम्राज्य की कहानी?

याचिका में बालासाहेब भगत के 15 वर्षों के कार्यकाल पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं:

  • अचानक बढ़ी संपत्ति: वर्ष 2010 में एक फ्लैट खरीदने के लिए 5 लाख रुपये जुटाने में असमर्थ रहे भगत के पास आज 20-25 लाख रुपये के दो फ्लैट (एक लॉटरी से और एक 2019 में खरीदा हुआ) और गांव में अज्ञात संपत्ति होने का दावा किया गया है।
  • सोसाइटी का निजीकरण: आरोप है कि भगत सोसाइटी के ऑफिस को अपना निजी दफ्तर समझ बैठे हैं। ऑफिस में एयर कंडीशनर (AC) और 25 हजार रुपये की कुर्सी सोसाइटी के फंड से लगवाई गई है।

सोसाइटी कार्यालय या ‘रूम दलाली’ का केंद्र?

याचिका में सबसे गंभीर आरोपों में से एक सोसाइटी के आधिकारिक कार्यालय का निजी स्वार्थ के लिए दुरुपयोग है। आरोप है कि सोसाइटी का ऑफिस अब निवासियों की समस्याओं के समाधान का केंद्र न रहकर ‘रूम दलाली’ (Room Brokering) का एक व्यवस्थित अड्डा बन चुका है।

तानाशाही का आलम यह है कि:

  • कमेटी में एकाधिकार: सोसाइटी की 13 सदस्यों वाली प्रबंध समिति (Managing Committee) में केवल उन्हीं लोगों को जगह दी जाती है जो अध्यक्ष बालासाहेब भगत की हर बात और हर फैसले में ‘हां में हां’ मिलाते हैं।
  • विरोधियों को दरकिनार: जो सदस्य या निवासी सत्य और न्याय की बात करते हैं या अध्यक्ष की मनमानी पर सवाल उठाते हैं, उन्हें जानबूझकर समिति से दूर रखा जाता है और उनकी आवाज को दबाने का प्रयास किया जाता है।
  • कार्यालय का निजी इस्तेमाल: सोसाइटी का कार्यालय बालासाहेब भगत के व्यक्तिगत नियंत्रण में है। यह कार्यालय केवल तब बंद होता है जब अध्यक्ष अपने गांव जाते हैं, अन्यथा यह प्रतिदिन उनके निजी हितों को साधने के लिए खुला रहता है। इतना ही नहीं, सोसाइटी के फंड से ऑफिस में एसी (AC) और महंगी कुर्सियों जैसी सुख-सुविधाएं जुटाना, निवासियों के पैसे का सरासर दुरुपयोग है।

सुरक्षा से खिलवाड़ और कानून का मजाक

याचिका में सबसे खतरनाक पहलू आपातकालीन रास्तों (Emergency Exits) को ‘जागीर’ समझने का है:

  • हेलीकॉप्टर वाले बयान का अहंकार: जब निवासियों ने पूछा कि अवैध पार्किंग से फायर ब्रिगेड की गाड़ी अंदर कैसे आएगी, तो भगत ने कथित तौर पर मजाक उड़ाते हुए कहा, “फायर ब्रिगेड को छोड़ो, मैं हेलीकॉप्टर बुला लूंगा।”
  • खतरनाक बोर्ड: सोसाइटी की मुख्य एंट्री पर 300 किलो का एक भारी बोर्ड लगा रखा है, जो पूर्व में गिर भी चुका है। इसके बावजूद अपनी जिद में उन्होंने इसे फिर से लगवा दिया, जो किसी भी राहगीर की जान ले सकता है।
  • MHADA का जुर्माना और मिलीभगत: MHADA ने अवैध निर्माण के लिए 1 लाख 8 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था, लेकिन उसके बाद भी अधिकारी बी.एस. कटरे और अन्य की मिलीभगत से उन्हें क्लीन चिट दे दी गई।

अभिषेक अनिल वशिष्ठ की चेतावनी

अभिषेक अनिल वशिष्ठ का स्पष्ट कहना है कि जब तक बालासाहेब भगत पर MHADA द्वारा FIR दर्ज नहीं की जाती, यह मुहिम जारी रहेगी। भगत का यह अहंकार कि “अभिषेक वशिष्ठ किसी भी कोर्ट में चले जाएं, मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते,” अब न्यायालय के सामने एक बड़ी चुनौती बन गया है।

वशिष्ठ वाणी इस मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है। क्या न्यायालय इस 15 साल पुराने ‘अवैध साम्राज्य’ को ढहाने के आदेश देगा? यह आने वाला समय ही बताएगा।

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