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बड़ी खबर: MHADA के अधिकारी म.वि. माकणे पर कोर्ट का शिकंजा, प्रमोशन के बाद भी नहीं बच पाएंगे भ्रष्टाचार के सवालों से!

मुंबई: भ्रष्ट अधिकारियों के लिए ‘प्रमोशन’ का रास्ता अब आसान नहीं रहने वाला है। वशिष्ठ मीडिया हाउस के संस्थापक और समूह समाचार पत्र के मालिक अभिषेक अनिल वशिष्ठ ने MHADA के अधिकारी म.वि. माकणे को सीधे कानूनी कटघरे में खड़ा कर दिया है। माकणे के हालिया ‘प्रमोशन’ के बावजूद, अब उन्हें न्यायालय में अपने उन फैसलों और प्रशासनिक लापरवाही का हिसाब देना होगा, जिसने मालवणी की स्वप्नपूर्ति सोसाइटी में कानून का मजाक उड़ाकर रख दिया था।

क्या है माकणे के खिलाफ कोर्ट में दायर याचिका का आधार?

वशिष्ठ मीडिया हाउस के कानूनी सलाहकार ओम प्रकाश मिश्रा ने पुष्टि की है कि कोर्ट द्वारा जारी समन 6 जुलाई तक संबंधित अधिकारियों को मिल जाएगा। माकणे को अब कोर्ट में इन सवालों के जवाब देने होंगे:

  • FIR से किनारा क्यों?: बालासाहेब भगत द्वारा किए गए अवैध निर्माण को MHADA की जांच में दोषी पाए जाने और 1 लाख 8 हजार रुपये का जुर्माना लगाने के बाद भी FIR क्यों नहीं दर्ज की गई?
  • झूठे वादे और सेटिंग का आरोप: मीडिया के सामने ‘मालवणी पुलिस को पत्र लिखने’ का झूठा वादा क्यों किया गया? वरिष्ठ अधिकारियों के मना करने का बहाना बनाकर मामले को रफा-दफा क्यों किया गया?
  • सुरक्षा से खिलवाड़: आपातकालीन रास्तों (Emergency Exits) को अवैध पार्किंग में तब्दील करने वालों को बचाने के लिए माकणे ने आखिर किसका संरक्षण दिया?
  • चुनिंदा कार्रवाई का रहस्य: जब विभाग ने स्वयं नोटिस में कई अवैध निर्माणों की पहचान की थी, तो केवल एक ही निर्माण को क्यों तोड़ा गया? बाकी बचे अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलाने से आखिर किसने रोका? क्या यह किसी रसूखदार के दबाव में की गई ‘सेटिंग’ थी?

प्रमोशन या सिस्टम का मजाक?

अभिषेक अनिल वशिष्ठ ने स्पष्ट किया है कि म.वि. माकणे को पद से हटाए जाने तक यह कानूनी लड़ाई जारी रहेगी। वशिष्ठ ने कहा, “जब तक माकणे जैसे अधिकारी सिस्टम में बैठे हैं, तब तक बालासाहेब भगत जैसे माफिया बेखौफ होकर अवैध निर्माण और पार्किंग करते रहेंगे।” उन्होंने इसे सिस्टम का मजाक बताया है, जहाँ ईमानदारी की जगह भ्रष्टाचार को ‘प्रमोशन’ दिया जा रहा है।

वशिष्ठ वाणी की पैनी नजर

वशिष्ठ वाणी इस पूरे प्रकरण पर बारीकी से नजर बनाए हुए है। यह देखना दिलचस्प होगा कि न्यायालय इस मामले में क्या कड़ा रुख अपनाता है और क्या प्रशासनिक जवाबदेही तय हो पाती है।

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