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विशेष रिपोर्ट: मीडिया के चक्रव्यूह में फंसी जनता—सच्चाई और प्रोपेगेंडा के बीच का खेल

नई दिल्ली: पिछले कुछ वर्षों में देश का मीडिया परिदृश्य पूरी तरह से बदल चुका है। आज सूचना के इस दौर में आम जनता एक ऐसे ‘चक्रव्यूह’ में फंसी है, जहाँ उसे सच और झूठ के बीच अंतर करना कठिन होता जा रहा है। ‘वशिष्ठ वाणी’ की पड़ताल में यह सामने आया है कि मीडिया के दो अलग-अलग धड़े जनता की भावनाओं को भुनाने में लगे हैं, जबकि असली मुद्दों से ध्यान पूरी तरह भटक चुका है।

दो धड़े, एक ही उद्देश्य: एजेंडा बनाम लाभ

आज मीडिया दो खेमों में बंटा हुआ स्पष्ट दिखाई देता है:

  1. ‘गोदी मीडिया’ का एक खेमा: यह खेमा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को चमकाने में दिन-रात जुटा हुआ है। यहाँ धरातल पर हुए विकास कार्यों की समीक्षा करने के बजाय, केवल गुणगान करना ही पत्रकारिता का मुख्य आधार बन गया है। इनके लिए लाभ के ‘दोनों हाथों में लड्डू’ हैं—एक तरफ जनता की व्यूअरशिप से होने वाली कमाई, और दूसरी तरफ सरकारी विज्ञापनों का भारी-भरकम बजट।
  2. सोशल मीडिया का ‘समानांतर खेमा’: वहीं दूसरी तरफ, सोशल मीडिया पर एक वर्ग ऐसा है जो केवल सरकार की बुराई और आलोचना को ही अपना हथियार बनाए हुए है। यह खेमा अपनी सामग्री को ‘सच्चाई उजागर करने’ के नाम पर पेश करता है, लेकिन इनका प्राथमिक उद्देश्य भी एल्गोरिदम के जरिए व्यूज बटोरकर मोटी कमाई करना ही है।

पिसी जा रही है आम जनता

इस पूरे खेल में असली नुकसान आम जनता का हो रहा है। समाज दो विचारधाराओं में बुरी तरह बंट चुका है:

  • एक वर्ग पीएम मोदी की प्रशंसा सुन-सुनकर खुश हो रहा है।
  • दूसरा वर्ग सरकार के प्रति अपने गुस्से को साझा करके आत्मसंतुष्टि पा रहा है।

दोनों ही खेमे जनता की भावनाओं को ‘इमोशनल ट्रिगर’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। परिणाम यह है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी और महंगाई जैसे गंभीर मुद्दे हाशिए पर चले गए हैं। जनता के इन दो हिस्सों को आपस में लड़ाकर मजे कुछ मुट्ठी भर लोग ले रहे हैं।

कड़वा है पर सच है: क्या हम मूर्ख बन रहे हैं?

विश्लेषकों का मानना है कि भारत में जनता को बहकाना बेहद आसान हो गया है। जब कोई व्यक्ति ईमानदारी से सिस्टम की कमियों को उजागर करने और जनता की आवाज बनने की बात करता है, तो उसे अक्सर ‘अविश्वसनीय’ मान लिया जाता है। इसके विपरीत, जो खुलेआम झूठ और प्रोपेगेंडा परोस रहे हैं, जनता उन्हीं के बहकावे में आकर अपनी निष्ठाएं तय कर रही है।

2015 से चला आ रहा यह सिलसिला अब एक गहरी खाई बन चुका है। आज जरूरत इस बात की है कि जनता मीडिया के इस ‘व्यूज-आधारित धंधे’ को समझे। जब तक आम नागरिक खुद तार्किक होकर सवाल नहीं पूछेगा, तब तक यह दोनों खेमे इसी तरह ‘वशिष्ठ वाणी’ के निष्पक्ष विश्लेषण को दबाकर अपने फायदे की दुकान चलाते रहेंगे।

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