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क्या यही है ‘अमृतकाल’ का असली चेहरा? प्रधानमंत्री मोदी जी, जनता जवाब चाहती है!

नई दिल्ली: राजनीति का अर्थ था—जन-कल्याण। विकास का अर्थ था—हर हाथ को काम और हर पेट को रोटी। लेकिन आज देश की तस्वीर कुछ और ही बयां कर रही है। क्या भारत की राजनीति अब उन्हीं आदर्शों पर चल रही है, जिन्हें कभी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज नेताओं ने गढ़ा था? या फिर हम उस दौर में पहुंच चुके हैं जहां सवाल पूछना ही ‘देशद्रोह’ या ‘सत्ता का अपमान’ मान लिया गया है?

‘अच्छे दिन’ का वादा और आज का सन्नाटा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, देश ने आपसे ‘अच्छे दिन’ का सपना देखा था। जनता ने विकास की उम्मीद की थी। लेकिन आज जनता विकास की बात करना भूलकर डर के साये में जीने को मजबूर है। जिस भाजपा की पहचान अनुशासित और वैचारिक राजनीति थी, आज वह ‘भर्ती मंत्री’ और जोड़-तोड़ की राजनीति की प्रयोगशाला बनकर रह गई है। क्या विकास के मुद्दे अब इतने छोटे हो गए हैं कि उन्हें हाशिए पर डाल दिया गया है?

मीडिया और विपक्ष का ‘साइलेंस’

कहा जाता है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया होता है, लेकिन आज ईडी (ED) और सीबीआई (CBI) के नाम का ऐसा ‘लोकतांत्रिक डर’ फैलाया गया है कि बड़े-बड़े मीडिया घराने भी घुटने टेक चुके हैं। सत्ता के गलियारों में सवाल पूछने की हिम्मत अब किसी में नहीं दिखती। क्या आप विपक्ष को भी इतना कमजोर कर देना चाहते हैं कि आने वाले समय में सवाल पूछने वाली आवाजें ही सुनाई न दें?

वशिष्ठ वाणी: न डरेंगे, न झुकेंगे

सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन इतिहास हमेशा याद रखता है। आज ‘वशिष्ठ वाणी’ आपसे यह सवाल इसलिए पूछ रहा है क्योंकि हम जवाबदेही में विश्वास रखते हैं। हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं:

  • आज आपकी सत्ता है, तो हम आपसे सवाल पूछ रहे हैं।
  • कल किसी और की सत्ता होगी, हम उनसे भी तीखे सवाल पूछेंगे।
  • सत्ता किसी की भी हो, जनहित और लोकतंत्र के पहरेदार के रूप में ‘वशिष्ठ वाणी’ कभी नहीं झुकेगा।

प्रधानमंत्री जी, जनता को डर नहीं, सुरक्षा चाहिए। उसे राजनीति का खेल नहीं, विकास का फल चाहिए। अंततः आपकी यह राजनीति किस दिशा में जा रही है? क्या भारत का लोकतंत्र अब केवल सत्ता के केंद्रीकरण का नाम बनकर रह जाएगा?

देश अब जवाब चाहता है—विकास का, रोजगार का और उस भरोसे का जो जनता ने एक समय आप पर किया था।


[वशिष्ठ वाणी] सत्य की खोज, निर्भीक आवाज।

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