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‘सकंट में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ’— जब जनहित की खबरों पर भी मौन साध ले प्रशासन, तो आम आदमी कहां जाए?

– • लेखअभिषेक अनिल वशिष्ठ •

भारतीय लोकतंत्र की नींव इस विश्वास पर टिकी है कि जब कार्यपालिका, विधायिका या न्यायपालिका से आम आदमी निराश होगा, तो चौथा स्तंभ यानी ‘मीडिया’ उसकी आवाज बनेगा। लेकिन आज मुंबई की जमीनी हकीकत देखकर यह गंभीर सवाल उठाना लाजिमी हो गया है कि— “क्या अब जनहित की खबरें प्रकाशित करने का कोई मोल नहीं रह गया है?” जब प्रामाणिक साक्ष्यों और जन-सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर लगातार खबरें छापने के बाद भी स्थानीय प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारी कुंभकर्णी नींद से न जागें, तो यह मान लेना गलत नहीं होगा कि व्यवस्था में बैठे कुछ तत्वों के मन से कानून और जवाबदेही का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है।

‘वशिष्ठ वाणी’ ने हमेशा कॉरपोरेट चकाचौंध से दूर रहकर मुंबई की आम जनता, उनके अधिकारों और सुरक्षा से जुड़े बुनियादी मुद्दों को पूरी ईमानदारी से उठाया है। लेकिन हाल के दिनों में म्हाडा (MHADA), बीएमसी (BMC) और ट्रैफिक विभाग की जो कार्यशैली सामने आई है, वह चिंताजनक भी है और हैरान करने वाली भी। मंत्रियों से लेकर संतरी तक, और सांसदों से लेकर नगरसेवकों तक, ऐसा प्रतीत होता है कि स्थानीय स्तर पर जनता की परेशानियों को ठंडे बस्ते में डाल देना ही अब प्रशासनिक नीति बन चुकी है।

हम देश के शीर्ष नेतृत्व और जनता की अदालत के सामने ऐसे चार जीवंत उदाहरण रख रहे हैं, जो इस प्रशासनिक अनदेखी को साफ बयां करते हैं:

  • पहला मामला (मालवणी, सामना नगर): म्हाडा की खुली जमीन पर आपातकालीन निकास (Emergency Exit Route) को अवरुद्ध कर अवैध पार्किंग का खेल धड़ल्ले से चलाया गया। सोसायटियों के मालिकों से वर्षों तक अवैध वसूली की गई। जब ‘वशिष्ठ वाणी’ ने इस गंभीर सुरक्षा चूक का पर्दाफाश किया, तो उम्मीद थी कि म्हाडा के अधिकारी तुरंत हरकत में आएंगे। परंतु, उप-निबंधक कार्यालय में बैठे अधिकारी बी.एस. कटारे ने इस पर ठोस कार्रवाई करने के बजाय, कथित तौर पर आरोपी को संरक्षण देने की नीति अपनाई।
  • दूसरा और तीसरा मामला (कंदिवली, एकता नगर रोड): कंदिवली ट्रैफिक विभाग की कमान जब से अधिकारी सतीश राउत के हाथों में आई है, तब से क्षेत्र की मुख्य सड़कें अवैध पार्किंग और कमर्शियल वाहनों के अवैध अड्डों में तब्दील हो चुकी हैं। इसी एकता नगर रोड पर सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाते हुए ‘भारत गैस’ के सिलेंडरों से भरे वाहनों का अघोषित गोदाम बना दिया गया है। यह किसी बड़े हादसे को आमंत्रण देने जैसा है। इस विषय में उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस तक को लिखित रूप से अवगत कराया गया, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी बारूद के इस ढेर को रिहायशी इलाके से नहीं हटाया गया।
  • चौथा मामला (मालाड, वार्ड 35): मालाड वेस्ट के वार्ड क्रमांक 35 में भू-माफियाओं द्वारा धड़ल्ले से अवैध निर्माण को अंजाम दिया जा रहा है। स्थानीय नागरिकों की शिकायतों और मीडिया रिपोर्ट्स के बावजूद, क्षेत्र के सांसद पीयूष गोयल और स्थानीय नगरसेवक योगेश वर्मा की चुप्पी इस पूरे घटनाक्रम को एक अघोषित संरक्षण देने की ओर इशारा करती है।

आखिर यह दुस्साहस आता कहां से है? सच्चाई यह है कि मुख्यधारा (Mainstream) का बड़ा मीडिया इन स्थानीय और जनता के जीवन से सीधे जुड़े मुद्दों को अपने प्राइम-टाइम में जगह नहीं देता। और जब ‘वशिष्ठ वाणी’ जैसे पंजीकृत, स्वतंत्र और निष्पक्ष माध्यम इन खबरों को पूरी जिम्मेदारी से उठाते हैं, तो अधिकारी हमारे सीमित दायरे का फायदा उठाकर खबरों को नजरअंदाज कर देते हैं।

एक स्वतंत्र समाचार पत्र और डिजिटल मीडिया हाउस होने के नाते, हम माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी और राज्य के मुख्यमंत्री-उपमुख्यमंत्री से यह सीधा आग्रह करते हैं: आप केवल Google पर ‘Vashishtha Vani’ सर्च करके देखें कि इस मंच ने जनहित में कितने प्रामाणिक मुद्दे उठाए हैं। इन चारों मामलों की एक निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए।

‘वशिष्ठ वाणी’ सत्ता पक्ष या विपक्ष के किसी एजेंडे के तहत काम नहीं करता। हमारा एकमात्र संकल्प जनता की सुरक्षा और व्यवस्था की पारदर्शिता है। अधिकारी आंखें मूंदें या नेता मौन रहें, हम जनता की आवाज को दबाने नहीं देंगे और व्यवस्था की आंखों में आंखें डालकर सच लिखना जारी रखेंगे।

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