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‘वशिष्ठ वाणी’ की खबरों से बेअसर मुख्यमंत्री और बहरा सिस्टम: कांदिवली में ‘भारत गैस’ की लापरवाही पर बड़े हादसे का इंतजार क्यों?

मुंबई: पत्रकारिता का काम सोए हुए सिस्टम को जगाना और जनता की आवाज को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाना है, लेकिन जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग और खुद सूबे के मुखिया ही आखें मूंद लें, तो लोकतंत्र की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। कांदिवली वेस्ट के एकता नगर इलाके में ‘भारत गैस एजेंसी’ ने पूरे रोड को गैस सिलेंडरों का खुला और अवैध गोदाम बना दिया है। ‘वशिष्ठ वाणी’ पिछले कई महीनों से इस गंभीर और जानलेवा विषय पर लगातार खबरें प्रकाशित कर सूबे के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और स्थानीय प्रशासन का ध्यान इस ओर खींच रहा है, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात है।

आग की चिंगारी और मौत का खेल: क्या पूर्व के हादसे से भी नहीं ली सीख?

अभी कुछ ही दिनों पहले इसी इलाके में आग लगने की एक भयानक घटना घटी थी, जिसने पूरे क्षेत्र को दहला दिया था। अब जरा सोचिए कि जहाँ भारत गैस सिलेंडरों से भरे दर्जनों वाहन अवैध रूप से सड़क पर चौबीसों घंटे खड़े रहते हैं, अगर वह चिंगारी इन सिलेंडरों तक पहुंच जाती, तो क्या होता? क्या कांदिवली वेस्ट को एक बड़े मलबे में तब्दील करने की तैयारी चल रही है?

ताज्जुब की बात यह है कि इतनी बड़ी लापरवाही और पिछले हादसे के बावजूद न तो भारत गैस की एजेंसी के कान पर जूं रेंग रही है और न ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री इस पर कोई कड़ा संज्ञान ले रहे हैं।


2014 के बाद की पत्रकारिता: ‘खबरें छपती रहेंगी, मंत्रियों का क्या बिगड़ेगा?’

यह मुद्दा आज के दौर के एक बेहद कड़वे और गंभीर सच को उजागर करता है। साल 2014 के बाद से प्रशासनिक और राजनीतिक रवैये में एक अजीब सी ढिठाई आ गई है। आज स्थिति यह हो चुकी है:

  • असरहीन होती जनहित की खबरें: जो खबरें सीधे सरकार की कमियों, प्रशासनिक मिलीभगत या बड़े कॉरपोरेट्स की लापरवाही को उजागर करती हैं, सरकार को उनसे अब कोई फर्क नहीं पड़ता।
  • मर्जी का तंत्र: आज का सिस्टम केवल अपनी मर्जी से चलता है। अगर मंत्रियों और आला अधिकारियों का ‘दिल’ करेगा, तो वे दिखावे के लिए दो मिनट की कार्रवाई करेंगे, और दिल नहीं किया तो मीडिया चाहे जितनी दीवार पर सिर पीट ले, अखबारों में पन्ने के पन्ने रंग दे, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
  • नेताओं की बेफिक्री: वातानुकूलित केबिनों और भारी सुरक्षा के बीच रहने वाले इन मंत्रियों और अधिकारियों का भला क्या बिगड़ने वाला है? अगर कोई बड़ा हादसा हुआ भी, तो जान सिर्फ उस गरीब और आम जनता की जाएगी जो एकता नगर के उस रोड से रोजाना गुजरती है।

वशिष्ठ वाणी की दोटूक: जिम्मेदारी तय होनी ही चाहिए!

हम प्रशासन को यह साफ कर देना चाहते हैं कि एकता नगर रोड कोई गैस गोदाम नहीं, बल्कि आम नागरिकों के आने-जाने का रास्ता है। सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर रिहायशी इलाके के पास इस तरह सिलेंडरों का अंबार लगाना कानूनन अपराध है। अगर भविष्य में यहाँ कोई भी छोटी-बड़ी अनहोनी या गैस ब्लास्ट होता है, तो उसकी सीधी जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस, बीएमसी और खुद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कार्यालय की होगी। ‘वशिष्ठ वाणी’ मंत्रियों की इस बेरुखी के आगे झुकने वाली नहीं है; जनहित के इस मुद्दे को तब तक उठाया जाएगा, जब तक कि इस अवैध और जानलेवा खतरे को यहाँ से हटा नहीं दिया जाता।

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