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महा-कार्रवाई या महा-मजाक? चारकोप सिग्नल पर BMC के ‘चाबुक’ की हवा निकली; 12 घंटे में फिर जमा अवैध बाजार का ‘साम्राज्य’

मुंबई (वशिष्ठ वाणी विशेष): क्या मुंबई का प्रशासन भू-माफियाओं और अवैध कब्जाधारियों के आगे घुटने टेक चुका है? मलाड वेस्ट के चारकोप सिग्नल की मौजूदा स्थिति तो यही गवाही दे रही है। वशिष्ठ वाणी द्वारा पोल खोले जाने के बाद BMC ने कार्रवाई का जो ‘नाटक’ रचा था, उसकी हकीकत 12 घंटे के भीतर ही बेनकाब हो गई। फुटपाथ पर फिर से पौधों, खिलौनों और हेलमेट की दुकानें सज गई हैं, जैसे प्रशासन को खुली चुनौती दी जा रही हो।

दिखावे की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

BMC P-North वार्ड के अधिकारियों ने वशिष्ठ वाणी की खबर के दबाव में आकर कुछ बैनर फाड़े और अस्थायी शेड हटाए। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि असली ‘कैंसर’ यानी फुटपाथ पर पसरे उस अवैध व्यापार को क्यों नहीं छुआ गया?

  • सवाल: क्या यह कार्रवाई केवल रिपोर्टर्स का मुंह बंद करने के लिए थी?
  • हकीकत: कार्रवाई के कुछ ही घंटों बाद कब्जाधारी उसी ठसक के साथ वापस लौटे, जिससे साफ पता चलता है कि उन्हें “ऊपर” से अभयदान प्राप्त है।

भ्रष्टाचार की बू या ‘खाकी-खादी’ का संरक्षण?

जनता अब खुलेआम पूछ रही है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है कि प्रशासन इन कब्जाधारियों को जड़ से नहीं उखाड़ पा रहा?

  1. हफ्ता वसूली का खेल: क्या BMC के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की जेबें इस अवैध बाजार की कमाई से गरम हो रही हैं?
  2. सफेदपोशों का हाथ: क्या किसी स्थानीय नेता का वरदहस्त इन व्यापारियों पर है, जिसके डर से अधिकारी केवल ‘फोटोजेनिक’ कार्रवाई करके लौट आते हैं?
  3. अंधा प्रशासन: फुटपाथ पर व्यापार चल रहा है, राहगीर सड़क पर चलने को मजबूर हैं, दुर्घटनाएं हो रही हैं, लेकिन प्रशासन ‘सब चंगा है’ की नींद सो रहा है।

वशिष्ठ वाणी का सीधा प्रहार: अब आर-पार की जंग!

वशिष्ठ वाणी इस मुद्दे को तब तक उठाता रहेगा जब तक चारकोप सिग्नल का फुटपाथ आम जनता को वापस नहीं मिल जाता। यह केवल अतिक्रमण का मामला नहीं है, बल्कि यह करदाताओं के हक की चोरी है।

चेतावनी: अगर BMC ने अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं किया और इस कैंसर को जड़ से खत्म नहीं किया, तो प्रशासन की इस ‘साठगांठ’ के खिलाफ बड़ा जन-आंदोलन तय है। जवाब तो देना होगा—चाहे वो वार्ड ऑफिसर हों या स्थानीय जनप्रतिनिधि!

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