जब किसी लोकतांत्रिक देश में कानून-व्यवस्था की साख पर सवाल उठते हैं, तो अक्सर उंगलियां पुलिस थानों की कार्यशैली पर उठती हैं। लेकिन जब पुलिस प्रशासन का रवैया इतना संवेदनहीन और बेफिक्र हो जाए कि सबूतों के साथ प्रकाशित खबरों, गंभीर कानूनी धाराओं और जनता की चीख-पुकार का उस पर रत्ती भर भी असर न पड़े—तब यह मानना पड़ेगा कि कानून का राज खत्म हो चुका है और ‘खाकी’ के संरक्षण में केवल सौदेबाज़ी चल रही है।
‘वशिष्ठ वाणी’ ने बीते दो दिनों में दो बड़ी रिपोर्टें छापीं। पहली रिपोर्ट में राज्य के मुखिया और गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस की प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल दागे गए, और दूसरी रिपोर्ट में DCP Zone 11 की चुप्पी को कटघरे में खड़ा किया गया। लेकिन नतीजा क्या निकला?
कानून की धज्जियां और सौदेबाज़ी का अड्डा बनी पुलिस चौकी
मामला सिर्फ एक एफआईआर (FIR No. 1584/2026) या कागजी धाराओं तक सीमित नहीं है। मामला उस पीड़ित महिला का है, जिसे बर्बरता से पीटा गया, जिसकी गवाही मौके पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों ने भी दी। कानून की किताबों में BNS 118(1) जैसी संज्ञेय और गैर-जमानती (Non-Bailable) धारा दर्ज होने का सीधा मतलब होता है कि आरोपी को तुरंत सलाखों के पीछे भेजा जाए।
लेकिन मालवणी पुलिस ने आरोपियों को जेल भेजने के बजाय महज एक ‘नोटिस’ थमाकर टहला दिया। जिस पुलिस चौकी को न्याय का मंदिर होना चाहिए था, वह ‘समझौते का सौदागर’ बन चुकी है। चौकी के भीतर दलालों को बुलाकर 30-35 हजार रुपये का गणित समझाया जाता है, और जब पीड़िता अपने अधिकार के लिए अड़ती है, तो उसे क्रॉस-केस का डर दिखाया जाता है।
DCP साहब… क्या आपकी कुर्सी कानून से भी ऊंची है?
एक संपादक के नाते हमारा सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न DCP Zone 11 से है। एक पूरे ज़ोन के प्रशासनिक प्रमुख होने के नाते क्या उनका यह कर्तव्य नहीं बनता कि वे अपनी नाक के नीचे चल रही इस खुली मनमानी पर तुरंत जांच बैठाएं? लेकिन DCP की खामोशी यह संदेश देती है मानो उन्हें अपने पद और कुर्सी का इतना अहंकार है कि एक पीड़ित महिला की गुहार और मीडिया के सवाल उनके लिए कोई मायने नहीं रखते।
यदि शीर्ष अधिकारी अपने मातहत अधिकारियों की मनमानी पर आँखें मूंद लें, तो नीचे के कर्मचारियों को यही संदेश जाता है कि— “अखबार में खबर छपने दो, सोशल मीडिया पर ट्वीट होने दो, तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगड़ेगा क्योंकि ऊपर हमारा हाथ है।”
मुख्यमंत्री तक फरियाद पहुँचना दूर की कौड़ी, तो न्याय कौन देगा?
रही बात राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की, तो आम जनता अच्छी तरह जानती है कि सत्ता के भारी-भरकम प्रोटोकॉल को लांघकर किसी आम महिला की फरियाद सीधे मुख्यमंत्री की मेज तक पहुँचना कितना कठिन काम है। इसी प्रशासनिक खाई और जनता की मजबूरी का फायदा निचले स्तर के अधिकारी उठा रहे हैं।
अदालतों में तारीख-पर-तारीख का ढर्रा आम आदमी को तोड़ देता है, और पुलिस अफसर इसी लाचारी को अपनी ढाल बना लेते हैं। वे जानते हैं कि पीड़ित कोर्ट के चक्कर काटते-काटते थक जाएगा, लेकिन उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा।
वशिष्ठ वाणी का यक्ष प्रश्न
अब पूरा शहर और देश यह देखने का इंतज़ार कर रहा है कि मालवणी पुलिस चौकी की वरिष्ठ अधिकारी रानीपुरी अपनी इस तथाकथित ‘टेक्निकल सोच’ का बहाना छोड़कर आरोपी को कब गिरफ्तार करती हैं।
- क्या कानून केवल आम जनता को डराने के लिए बचा है और अधिकारियों के लिए यह महज़ सौदेबाज़ी का ज़रिया है?
- अगर मीडिया के खुलासे, गवाहों के बयान और कानून की गैर-जमानती धाराएं भी किसी आरोपी को गिरफ्तार न करा सकें, तो इस देश में न्याय दिलाएगा कौन?
संपादकीय संकल्प
अधिकारी चाहें अपनी कुर्सियों के पीछे छुप जाएं, मंत्री चाहे मौन धारण कर लें—’वशिष्ठ वाणी’ की कलम न बिकी है और न रुकेगी। जब तक उस पीड़ित महिला को न्याय नहीं मिलता और कानून का मजाक उड़ाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होती, हम व्यवस्था की इस सड़न पर लगातार हमला बोलते रहेंगे।



















