- (विशेष संवाददाता, वशिष्ठ वाणी |
मुंबई: लोकतंत्र में जब चौथा स्तंभ (मीडिया) साक्ष्यों और कानून की किताबों का हवाला देकर किसी प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, तो उम्मीद की जाती है कि शासन में बैठे जिम्मेदार तुरंत हरकत में आएंगे। लेकिन मुंबई के मालवणी पुलिस स्टेशन का वर्तमान ढर्रा यह साबित करने के लिए काफी है कि अब अधिकारियों को न तो मीडिया के खुलासे का डर है, न ही पीड़िता के दर्द का।

08 अक्टूबर 2026 की FIR No. 1584/2026 में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 118(1) जैसी गंभीर और गैर-जमानती (Non-Bailable) धारा दर्ज होने के बावजूद, आरोपी आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। ‘वशिष्ठ वाणी’ द्वारा इस पूरे मामले का भंडाफोड़ किए जाने के बावजूद मालवणी पुलिस चौकी के वरिष्ठ अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है।
सूत्रों का बड़ा खुलासा: मालवणी पुलिस की ‘विशेष मेहरबानी’ से आरोपी खुलेआम बेखौफ!
इस पूरे मामले में सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, मालवणी पुलिस की मेहरबानी के चलते आरोपी आज भी खुलेआम घूम रहे हैं और पुलिस प्रशासन उन्हें छूने तक से बच रहा है। कानून के मुताबिक गैर-जमानती धारा में आरोपी को तुरंत सलाखों के पीछे होना चाहिए था, लेकिन पुलिस की इसी ‘मेहरबानी’ और ढील के कारण पीड़ित परिवार खौफ के साए में जीने को मजबूर है और आरोपी बेखौफ घूम रहे हैं।
“खबर छपने दो, हमारा कोई क्या बिगाड़ लेगा?”— क्या यही है अधिकारियों की मानसिकता?
इस पूरी कार्यशैली से एक बहुत ही भयावह संदेश सामने आ रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि निचले स्तर के अधिकारियों को ऊपर से यह मौन अभयदान मिला हुआ है कि— “अखबारों में रिपोर्ट छपने दो, सोशल मीडिया पर सवाल उठने दो, तुम बेफिक्र होकर अपना काम करो, तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”
- क्या है वो ‘टेक्निकल सोच’?: एक पीड़ित महिला, जिसे बर्बरता से पीटा गया है, जब न्याय मांगने वरिष्ठ अधिकारी के कार्यालय पहुँचती है, तो उसे सिर्फ यह रटा-रटाया जवाब मिलता है कि “हम टेक्निकल सोचेंगे।” सवाल उठता है कि गैर-जमानती धारा में गिरफ्तारी करने के लिए आखिर कौन सी ‘टेक्निकल पढ़ाई’ आड़े आ रही है?
- नोटिस देकर आरोपियों को खुली छूट: कानून के मुताबिक जिस अपराध में आरोपी को जेल में होना चाहिए था, उसे महज एक ‘नोटिस’ थमाकर निश्चिंत कर दिया गया। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का रवैया ऐसा है मानो वे पीड़िता से कह रहे हों कि “अब दोबारा तो नहीं मार रहा ना, तो इंतजार करो!”
17 अक्टूबर की वर्दीहीन धौंस और हवलदार विघे के मामले पर भी ‘सब गोलमाल’!
यह प्रशासनिक बेफिक्री केवल एक केस तक सीमित नहीं है। 17 अक्टूबर को जब मालवणी पुलिस स्टेशन का एक अधिकारी बिना पुलिस यूनिफॉर्म और बिना नेम-प्लेट के एक महिला पर रौब झाड़ रहा था, तब हवलदार स्वप्निल विघे ने अपने ही सीनियर का नाम बताने से साफ इनकार कर दिया था।
18 अक्टूबर को वरिष्ठ अधिकारी रानीपुरी ने केवल यह कहकर बात टाल दी थी कि “हवलदार को मेरे पास भेजो, मैं देख लेती हूँ।” आज हफ्तों बीत जाने के बाद भी न उस हवलदार पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई और न ही सिविल ड्रेस अधिकारी का नाम सार्वजनिक किया गया। इससे साफ जाहिर होता है कि मालवणी पुलिस चौकी में ‘सिस्टम सुधारने’ के बजाय ‘अपराध और अपनी गलतियों को ढपने’ की परंपरा पर काम चल रहा है।
न डीसीपी, न कमिश्नर, न गृह मंत्री— आखिर आम नागरिक कहाँ जाए?
पीड़ित परिवार और आम जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि मालवणी पुलिस चौकी में सुनवाई न हो, डीसीपी कार्यालय संज्ञान न ले, और कमिश्नर या गृह मंत्रालय से कोई त्वरित आदेश जारी न हो, तो नागरिक कहाँ जाएँ?
हर आम इंसान के पास इतना समय और साधन नहीं होता कि वह अदालतों के चक्कर काटे, जहाँ तारीख-पर-तारीख में सालों बीत जाते हैं। इसी लाचारी का फायदा उठाकर पुलिस अधिकारियों का मनोबल बढ़ा हुआ है। उन्हें पता है कि मीडिया को इग्नोर करो, पीड़ित को टहलाने में लगे रहो और अपने सीनियर्स को खुश रखो—नौकरी पर कोई आंच नहीं आएगी।
वशिष्ठ वाणी का बेबाक संदेश:
यदि अधिकारी यह सोचते हैं कि वे मीडिया की खबरों को अनदेखा करके और सूत्रों से सामने आ रही इस ‘मेहरबानी’ को छुपाकर मामले को दबा देंगे, तो वे गलतफहमी में हैं। ‘वशिष्ठ वाणी’ अपनी कलम की धार को कमजोर नहीं होने देगा। चाहे कोई संज्ञान ले या न ले, हम मालवणी पुलिस चौकी की इस मनमानी और पीड़ित महिला के साथ हो रहे अन्याय की आवाज को तब तक बुलंद करते रहेंगे, जब तक जवाबदेही तय नहीं हो जाती।














