हाल ही में सोशल मीडिया पर सामने आए उस संदेश ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें अमेरिका की ओर से यह कहा गया कि भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए “30 दिन की छूट” दी गई है। यह शब्दावली अपने आप में बेहद चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण प्रतीत होती है। आखिर भारत जैसे संप्रभु और शक्तिशाली देश को कोई दूसरा राष्ट्र “छूट” कैसे दे सकता है? क्या दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था को अब अपनी आर्थिक और कूटनीतिक नीतियों के लिए किसी अन्य देश की अनुमति की आवश्यकता है?

(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
भारत की जनता ने वर्ष 2014 और उसके बाद के चुनावों में भारी बहुमत से भाजपा को सत्ता सौंपी और को देश का नेतृत्व दिया। उस समय यह उम्मीद जताई गई थी कि भारत की विदेश नीति और अधिक मजबूत, आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी बनेगी। लेकिन जब अमेरिका की ओर से इस तरह के संदेश आते हैं और भारत की ओर से कोई ठोस और स्पष्ट प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती, तो स्वाभाविक रूप से जनता के मन में कई सवाल उठने लगते हैं।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति कई मौकों पर सार्वजनिक रूप से भारत और प्रधानमंत्री के बारे में बयान देते रहे हैं। कभी टैरिफ की बात होती है, कभी व्यापार की शर्तें सामने रखी जाती हैं, और कभी यह संकेत दिया जाता है कि भारत को क्या करना चाहिए और क्या नहीं। इन बयानों का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इससे यह संदेश देने की कोशिश की जाती है मानो भारत को किसी तरह की “इजाजत” दी जा रही हो।
यहीं से एक बड़ा और असहज सवाल उठता है—आखिर प्रधानमंत्री इतने संवेदनशील मुद्दों पर चुप क्यों हैं?
क्या यह केवल कूटनीतिक चुप्पी है, या इसके पीछे कोई ऐसी मजबूरी है जिसे देश की जनता नहीं जानती?
देश में यह चर्चा भी तेज हो रही है कि आखिर ऐसी क्या परिस्थिति है जिसके कारण बार-बार अमेरिका की ओर से ऐसे बयान दिए जाते हैं और भारत की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आती। कुछ लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि क्या बड़े उद्योगपतियों से जुड़े विवाद, विशेष रूप से से संबंधित अंतरराष्ट्रीय आरोपों का इस पर कोई प्रभाव है? या फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रही से जुड़ी तथाकथित “Epstein Files” जैसी बातों के कारण भारत की सरकार किसी दबाव में है?
ये सवाल भले ही आरोप न हों, लेकिन लोकतंत्र में जब पारदर्शिता नहीं दिखती तो इस प्रकार की शंकाएँ स्वाभाविक रूप से जन्म लेती हैं। इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि सरकार इन मुद्दों पर स्पष्टता दे, ताकि देश और दुनिया के सामने किसी भी प्रकार की गलतफहमी न बने।
भारत कोई छोटा या कमजोर देश नहीं है। यह दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति है, जिसकी अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और वैश्विक पहचान रही है। ऐसे में यदि किसी भी देश द्वारा यह संकेत दिया जाए कि भारत उसकी निगरानी या दिशा में काम करेगा, तो यह केवल राजनीतिक बहस का विषय नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न बन जाता है।
इतिहास गवाह है कि भारत ने लगभग दो शताब्दियों तक विदेशी शासन का दर्द झेला है। इसलिए आज जब कोई बाहरी शक्ति इस तरह के संकेत देती है और भारत की ओर से प्रतिक्रिया नहीं आती, तो लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर हमारी सरकार की चुप्पी का कारण क्या है।
देश की जनता प्रधानमंत्री से यह जानना चाहती है कि भारत की विदेश नीति पूरी तरह स्वतंत्र है या नहीं। यदि कोई देश भारत के बारे में इस तरह के बयान देता है, तो उसका जवाब क्या है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या वास्तव में ऐसी कोई मजबूरी है जिसके कारण सरकार सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देने से बच रही है?
लोकतंत्र में सवाल पूछना देश विरोध नहीं, बल्कि देश के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक होता है। आज यही सवाल देश के कई नागरिकों के मन में है— आखिर भारत की चुप्पी क्यों है, और प्रधानमंत्री को किस बात का इंतजार है?
क्योंकि यह केवल राजनीति का मुद्दा नहीं है, यह भारत के सम्मान, संप्रभुता और वैश्विक प्रतिष्ठा से जुड़ा प्रश्न है।














