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वशिष्ठ वाणी EXCLUSIVE: न्यायालय का भी डर नहीं? MHADA अधिकारी बी.एस. कटरे की ‘निरंकुश’ कार्यशैली पर उठे सवाल!

मुंबई (मालवणी): लोकतंत्र में जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और सरकारी कुर्सी पर बैठे अधिकारी खुद को कानून से ऊपर समझने लगें, तो व्यवस्था का चरमराना तय है। मालवणी की स्वप्नपूर्ति को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी में यही मंजर देखने को मिल रहा है। यहाँ MHADA अधिकारी बी.एस. कटरे की संदिग्ध चुप्पी और निष्क्रियता ने न केवल निवासियों की रातों की नींद हराम कर दी है, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

कोर्ट की दहलीज तक पहुँचा मामला, फिर भी कटरे को ‘फर्क’ नहीं!

सबसे चौंकाने वाला और गंभीर तथ्य यह है कि स्वप्नपूर्ति सोसाइटी का यह विवाद अब माननीय न्यायालय (Court) के संज्ञान में है। सामान्यतः किसी भी मामले के कोर्ट में जाने पर प्रशासन हरकत में आता है, लेकिन बी.एस. कटरे एक ऐसे अधिकारी साबित हो रहे हैं, जिन्हें न तो कानून का खौफ है और न ही कोर्ट के आदेशों की परवाह। सवाल यह उठता है कि क्या बी.एस. कटरे को किसी ‘अदृश्य शक्ति’ का संरक्षण प्राप्त है, जो उन्हें संविधान की मर्यादा लांघने का दुस्साहस दे रहा है?

‘मौत के बोर्ड’ और ‘ऑटो स्टैंड’ का साम्राज्य

सोसाइटी के अध्यक्ष बालासाहेब भगत पर ‘वशिष्ठ वाणी’ लगातार सबूतों के साथ रिपोर्टिंग कर रही है। अध्यक्ष ने सोसाइटी परिसर को निजी ‘ऑटो रिक्शा स्टैंड’ बनाकर रख दिया है। हद तो तब हो गई जब 300 किलो का भारी-भरकम बोर्ड, जो एक बार गिरकर अपनी जानलेवा क्षमता दिखा चुका है, उसे दोबारा जिद में आकर लगा दिया गया।


  • साक्ष्य: म्हाडा क्षेत्र निर्माण (गोरेगांव) द्वारा अवैध निर्माण के लिए 1,08,000 रुपये का जुर्माना भी ठोका जा चुका है।
  • हकीकत: इतने प्रमाणों और जुर्माने के बावजूद, बी.एस. कटरे ने अब तक अध्यक्ष के खिलाफ कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की?

बी.एस. कटरे से ‘वशिष्ठ वाणी’ के तीखे सवाल:

  1. कोर्ट से ऊपर कौन? जब मामला न्यायालय में है, तो आप अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर किसे फायदा पहुँचा रहे हैं?
  2. ज़मीर की कीमत क्या है? क्या 1.08 लाख का जुर्माना और निवासियों की सुरक्षा आपके लिए कोई मायने नहीं रखती?
  3. अनहोनी का इंतज़ार? यदि वह भारी बोर्ड किसी बच्चे या बुजुर्ग पर गिरता है, तो क्या बी.एस. कटरे अपनी वर्दी उतारकर इसकी सजा भुगतने को तैयार हैं?

संपादकीय टिप्पणी:

प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारी जनता के सेवक होते हैं, मालिक नहीं। बी.एस. कटरे का यह रवैया न केवल प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि यह सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) की श्रेणी में आता है। ‘वशिष्ठ वाणी’ इस मुद्दे को तब तक प्रमुखता से प्रकाशित करती रहेगी, जब तक मालवणी की जनता को न्याय नहीं मिल जाता और भ्रष्ट तंत्र घुटने नहीं टेक देता।

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