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बड़ा सवाल: मालवणी पुलिस के अधिकारियों पर कार्रवाई कब? जनता की सुरक्षा पर उठे गंभीर प्रश्न

मुंबई/वशिष्ठ वाणी। मुंबई पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मालवणी पुलिस थाने की अधिकारी अमृता देशमुख और PSI प्रफुल पर एक वर्ष बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई न होने से जनता में नाराज़गी बढ़ती जा रही है। सवाल साफ है—आखिर वरिष्ठ अधिकारी इन पर कब कार्रवाई करेंगे?

🔴 क्या है पूरा मामला?

बताया जा रहा है कि सामना नगर, मालवणी गेट नंबर 8 क्षेत्र में एक दीवार निर्माण के दौरान पेड़ की जड़ों को काटे जाने का मामला सामने आया था। इस पर समाजसेवी और पेड़ प्रेमी सम्राट बागुल ने बीएमसी में लिखित शिकायत दर्ज कराई।
जांच के बाद बीएमसी ने मालवणी पुलिस को लिखित सूचना भी भेजी, लेकिन आरोप है कि एक साधारण NC (नॉन-कॉग्निज़ेबल) दर्ज करने में पुलिस को लगभग तीन महीने लग गए।

🔴 पुलिस के रवैये पर सवाल

आरोप है कि जब समाजसेवी ने अधिकारी अमृता देशमुख से देरी को लेकर सवाल पूछा तो उन्होंने कथित तौर पर टालमटोल भरा जवाब दिया। मीडिया द्वारा पूछे गए सवालों पर भी संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
इसके बाद मीडिया की लीगल टीम के सलाहकार ओम प्रकाश मिश्रा ने मुंबई पुलिस के उच्च अधिकारियों को नोटिस भेजा, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

🔴 कोर्ट का हवाला, पर प्रमाण नहीं

मालवणी पुलिस के PSI प्रफुल का कहना है कि फेडरेशन के अध्यक्ष और सचिव पर FIR दर्ज करने के लिए बोरिवली कोर्ट से अनुमति मांगी गई है।
हालांकि, सवाल यह उठ रहा है कि:

  • NC दर्ज करने में तीन महीने क्यों लगे?
  • कोर्ट में दी गई शिकायत का कोई लिखित प्रमाण क्यों नहीं दिखाया जा रहा?
  • यदि प्रक्रिया चल रही थी, तो सात महीने बाद ही FIR की पहल क्यों?

🔴 डीसीपी से मुलाकात, फिर भी कार्रवाई नहीं

शिकायतकर्ता ने बोरिवली के वरिष्ठ अधिकारी (डीसीपी) से भी मुलाकात की थी। आश्वासन मिला कि जल्द कार्रवाई होगी, लेकिन कई महीने बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस है।

🔴 जनता की सुरक्षा पर उठे सवाल

लगातार देरी और जवाबों की कमी ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है—
क्या ऐसी कार्यप्रणाली में मुंबई की जनता सुरक्षित है?

कभी मुंबई पुलिस को देश की सबसे भरोसेमंद पुलिस माना जाता था, लेकिन हालिया घटनाओं ने लोगों के मन में शंका पैदा कर दी है।

🔴 मीडिया के साथ भेदभाव के आरोप

यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि अधिकृत मीडिया द्वारा सवाल पूछे जाने पर पुलिस असहज हो जाती है, जबकि कथित तौर पर बिना मान्यता वाले कुछ यूट्यूब रिपोर्टरों को आसानी से इंटरव्यू दिए जाते हैं।
मीडिया जगत का कहना है कि यदि यह सच है तो यह बेहद गंभीर विषय है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।


पूरा मामला अब केवल एक NC की देरी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पुलिस की जवाबदेही और पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न बन गया है।
मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग है कि:

  • मामले की निष्पक्ष जांच हो
  • जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो
  • और प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए

वशिष्ठ मीडिया का कहना है कि जब तक इस मामले में स्पष्ट कार्रवाई नहीं होती, जनता की आवाज़ उठाई जाती रहेगी।

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