Rahul Gandhi News: लोकसभा के शीतकालीन सत्र में आज विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने चुनाव सुधारों के नाम पर सत्ता पक्ष पर खुला हमला बोलते हुए तीन तीखे सवाल पूछकर पूरे सदन को स्तब्ध कर दिया। ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ विधेयक पर चल रही चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने जानबूझकर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को खत्म करने की साजिश रची है और इसे लोकतंत्र के इतिहास का सबसे बड़ा हमला बताया।
राहुल गांधी ने एक-एक करके तीन गंभीर सवाल उठाए:
- “आपने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर क्यों कर दिया?”
- उन्होंने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI होते थे, लेकिन 2023 के मुख्य चुनाव आयुक्त कानून में CJI की जगह केंद्रीय मंत्री को डाल दिया गया। राहुल ने इसे “चुनाव आयोग को सरकार का पिछलग्गू बनाने की सुनियोजित चाल” करार दिया।
- “चुनाव आयुक्तों को पद से हटने के बाद भी उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने से पूरी तरह छूट क्यों दी गई?”
- राहुल गांधी ने दावा किया कि भारत के इतिहास में पहली बार किसी संवैधानिक पदाधिकारी को इस तरह की ब्लैंकेट इम्युनिटी दी गई है। उनका कहना था कि अगर कोई आयुक्त जानबूझकर गलत काम करे, धांधली करे या पक्षपात करे, तो भी उसके खिलाफ केस नहीं चल सकेगा।
- “चुनाव के दौरान लगे लाखों सीसीटीवी कैमरों की फुटेज सिर्फ 45 दिन बाद नष्ट करने का नियम क्यों बनाया गया?”
- राहुल ने कहा कि अभी तक ये फुटेज एक साल तक रखी जाती थीं, जिससे कोई भी धांधली की शिकायत होने पर सबूत देखे जा सकते थे। अब 45 दिन में सबूत मिटा दिए जाएंगे, यानी “धांधली करो और सबूत मिटाओ” का लाइसेंस दे दिया गया है।
राहुल गांधी ने चेतावनी दी कि इन तीन बदलावों से चुनाव आयोग पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में आ जाएगा और आने वाले समय में जनता का वोट भी सुरक्षित नहीं रहेगा। उनका भाषण इतना प्रभावशाली था कि विपक्षी सांसदों ने मेजें थपथपाईं और “शर्म करो, शर्म करो” के नारे लगाए।
सत्ता पक्ष की ओर से जवाब देते हुए कुछ भाजपा सांसदों ने कहा कि नई व्यवस्था में विपक्ष के नेता को भी समिति में जगह दी गई है, इसलिए यह और पारदर्शी हो गई है। लेकिन राहुल गांधी ने तुरंत पलटवार करते हुए कहा, “दो बनाम एक का खेल है – प्रधानमंत्री और मंत्री मिलकर नेता प्रतिपक्ष को दबा देंगे।”
लोकसभा में इस मुद्दे पर बहस अभी भी जारी है और पूरे देश की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को बचाने के लिए कोई कदम उठाया जाएगा या नहीं। राजनीतिक गलियारों में इसे 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले का सबसे बड़ा संवैधानिक संकट माना जा रहा है।


