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मुख्यधारा मीडिया की विश्वसनीयता पर उठते सवाल: क्या सत्ता से सवाल पूछना अब जोखिम बन गया है?

मुंबई/वशिष्ठ वाणी: पिछले कुछ वर्षों में देश के मीडिया परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। आम दर्शकों के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत हुई है कि मुख्यधारा का मीडिया अब सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उसका बचाव करता हुआ अधिक दिखाई देता है। खासकर जब बात प्रधानमंत्री Narendra Modi की सरकार की हो, तो आलोचकों का कहना है कि टीवी चैनलों की बहसें अक्सर सरकार से जवाब मांगने के बजाय विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने पर केंद्रित रहती हैं।

दर्शकों का भरोसा क्यों घटा?

मीडिया विश्लेषकों का मानना है कि लगातार एकतरफा विमर्श ने दर्शकों के एक बड़े वर्ग को मुख्यधारा समाचार चैनलों से दूर कर दिया है। यही कारण है कि कई स्वतंत्र पत्रकार और पूर्व टीवी एंकर अब डिजिटल प्लेटफॉर्म, विशेषकर यूट्यूब, पर सक्रिय हो गए हैं — जहाँ वे बिना संस्थागत दबाव के सवाल उठा सकते हैं।

जनता के बीच यह धारणा भी मजबूत हुई है कि बड़े मीडिया संस्थान अब जनहित से अधिक व्यावसायिक हितों से संचालित हो रहे हैं। विज्ञापन, निवेश और कॉरपोरेट हितों का प्रभाव संपादकीय स्वतंत्रता पर हावी होता दिख रहा है। इसी पृष्ठभूमि में “गोदी मीडिया” शब्द प्रचलन में आया — जो उस मीडिया की ओर संकेत करता है जिसे सत्ता के प्रति आलोचनात्मक नहीं माना जाता।


सत्ता से सवाल बनाम विपक्ष से जवाब

आलोचना का एक बड़ा बिंदु यह है कि:

  • सरकार की नीतियों पर सीधे सवाल कम पूछे जा रहे हैं
  • विपक्ष से आक्रामक सवाल पूछकर उन्हें जिम्मेदार ठहराने की प्रवृत्ति बढ़ी है
  • बेरोज़गारी, महंगाई, संस्थागत स्वायत्तता जैसे मुद्दे बहस के केंद्र से गायब होते जा रहे हैं

विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका सत्ता और जनता के बीच सेतु की होती है — न कि किसी एक पक्ष की ढाल बनने की।


अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी उठ रहे प्रश्न

कुछ विश्लेषकों ने यह भी सवाल उठाया है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्थिति को लेकर मीडिया की भूमिका सीमित रही है। उदाहरण के तौर पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा कई मौकों पर सार्वजनिक बयानों या सोशल मीडिया के माध्यम से भारत से जुड़े मुद्दों पर टिप्पणी की गई, लेकिन इन पर गंभीर सार्वजनिक विमर्श अपेक्षाकृत कम देखने को मिला।

सोशल मीडिया पर कुछ वर्गों द्वारा यह भी चर्चा की जाती रही है कि बड़े कॉरपोरेट समूहों — जैसे Adani Group — से जुड़े अंतरराष्ट्रीय कानूनी मामलों या वैश्विक विवादों का भारत की कूटनीतिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। इसी तरह वैश्विक स्तर पर चर्चित नाम Jeffrey Epstein से जुड़ी फाइलों को लेकर भी समय-समय पर अटकलें लगाई जाती रही हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, फिर भी पारदर्शिता की मांग को लेकर बहस जारी है।


डर का माहौल या धारणा?

कुछ पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सत्ता से तीखे सवाल पूछना अब जोखिम भरा हो गया है। उनका कहना है कि आलोचना करने वालों को:

  • “राष्ट्र-विरोधी” कहे जाने का खतरा
  • कानूनी मामलों में उलझाए जाने की आशंका
  • संस्थागत दबाव का सामना

करना पड़ सकता है।

हालांकि सरकार और उसके समर्थक इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं कि भारत में मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र है और आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है।


मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि:

लोकतंत्र में मीडिया की विश्वसनीयता उसकी सत्ता से दूरी और जनता के प्रति जवाबदेही से तय होती है।

आज यदि मीडिया सरकार से सवाल नहीं पूछता, तो सत्ता परिवर्तन के बाद वही स्थिति नए शासकों के साथ भी दोहराई जा सकती है। इसलिए पारदर्शिता, जवाबदेही और संतुलित पत्रकारिता की मांग पहले से अधिक प्रासंगिक हो गई है।

समय के साथ तथ्य सामने आते हैं — और लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का ही होता है।

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