नई दिल्ली/वशिष्ठ वाणी | विशेष रिपोर्ट
लोकसभा में मंगलवार को वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित विशेष चर्चा एक बड़े राजनीतिक टकराव में बदल गई। बहस के दौरान AIMIM अध्यक्ष और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने ऐसा तीखा और विवादास्पद भाषण दिया, जिसने संसद से लेकर सोशल मीडिया तक जबरदस्त हलचल मचा दी।
लगभग 11 मिनट के इस भाषण में ओवैसी ने कहा कि वंदे मातरम को “अनिवार्य” करने की कोशिश संविधान की मूल भावना—धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता—के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि मातृभूमि को देवी के रूप में पूजा करने की बाध्यता “किसी भी एकेश्वरवादी धर्म के लोगों पर थोपना स्वीकार्य नहीं हो सकता।”
ओवैसी का तर्क: ‘आस्था नहीं छोड़ सकते, यही संविधान कहता है’
अपने भाषण की शुरुआत में ओवैसी ने संविधान की प्रस्तावना और अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा:
“दस्तूर का पहला पन्ना ही हमें इबादत, अकीदा और धर्म की पूरी आज़ादी देता है। फिर किसी नागरिक को देवी-देवता की पूजा के लिए मजबूर कैसे किया जा सकता है?”
उन्होंने वंदे मातरम के ऐतिहासिक संदर्भ समझाते हुए कहा कि इसके शुरू के दो छंद राष्ट्रभक्ति के प्रतीक हैं, लेकिन आगे के छंदों में मातृभूमि को दुर्गा, काली, लक्ष्मी आदि स्वरूपों में दर्शाया गया है।
उनका कहना था कि:
- यह ईसाई, मुस्लिम और यहूदी समुदाय की मान्यताओं के विरुद्ध है
- स्वतंत्र भारत की संविधान सभा ने भी “पूरे गीत” को स्वीकार नहीं किया
- 1937 में कांग्रेस ने सिर्फ पहले दो छंदों को गाने का फैसला किया था
- इसलिए इसे अनिवार्य करने की कोशिश संविधान-सम्मत नहीं
“हम कम देशभक्त नहीं… बस आस्था नहीं बेचेंगे”
ओवैसी ने आगे मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों—मौलाना हसरत मोहानी, मौलाना आजाद, बादशाह खान—का उल्लेख करते हुए कहा:
“इन लोगों ने देश के लिए जान दी, लेकिन अपनी आस्था नहीं छोड़ी। देशभक्ति के लिए इबादत बदलना जरूरी नहीं।”
उन्होंने यह भी कहा कि जिन्ना ने भी वंदे मातरम न गाने के सिद्धांत पर अडिग रहते हुए आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था।
सुप्रीम कोर्ट और संविधान सभा का हवाला
ओवैसी ने अपने तर्क मजबूत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का 1986 का बिजो एम्ब्रोज केस उद्धृत किया, जिसमें राष्ट्रीय गान न गाने पर सजा को असंवैधानिक बताया गया था।
उनका कहना था:
“वंदे मातरम पसंद हो सकता है, लेकिन अनिवार्य नहीं किया जा सकता। यह लोकतंत्र है, तानाशाही नहीं।”
संसद में हंगामा: ‘वंदे मातरम ज़िंदाबाद’ बनाम ‘संविधान ज़िंदाबाद’
ओवैसी के भाषण के बाद सदन में जमकर नारेबाज़ी हुई।
- BJP सांसद: “वंदे मातरम ज़िंदाबाद”
- विपक्ष सांसद: “संविधान ज़िंदाबाद”
स्पीकर को कई बार हस्तक्षेप करना पड़ा। चर्चा का माहौल पूरी तरह गरमा गया।
सोशल मीडिया पर तूफान – समर्थन और विरोध दोनों चरम पर
एक्स (ट्विटर) पर ओवैसी का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है:
- 35,000+ व्यूज़
- 3,500+ लाइक्स
- हजारों कमेंट्स, जिनमें तीखी प्रतिक्रियाएँ भी शामिल
समर्थक बोले:
- “संविधान की असली व्याख्या यही है।”
- “देशभक्ति का सबूत मांगना देशद्रोह है।”
- “हिंदू-मुस्लिम सब बराबर—धर्म स्वतंत्रता सर्वोपरि है।”
विरोधियों ने कहा:
- “वंदे मातरम सम्मान है, पूजा नहीं।”
- “यह तुष्टिकरण की राजनीति है।”
- “आस्था की आड़ में देशभक्ति कमजोर नहीं की जा सकती।”
BJP का पलटवार, विपक्ष का समर्थन
BJP के प्रवक्ताओं ने ओवैसी के बयान को “विभाजनकारी” कहा और कहा:
“वंदे मातरम राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। इसे धार्मिक चश्मे से देखना गलत है।”
कांग्रेस और सपा ने ओवैसी की बात का समर्थन करते हुए कहा:
“संविधान सभा का फैसला साफ था—जबरदस्ती नहीं होगी।”
ऐतिहासिक संदर्भ: यह गीत विवादों से घिरा क्यों रहा?
- 1882: आनंदमठ से वंदे मातरम की शुरुआत
- 1905: बंगाल विभाजन आंदोलन का मुख्य नारा
- 1937: कांग्रेस ने सिर्फ पहले दो छंद ही अपनाए
- 1949: संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगीत माना, लेकिन सीमित रूप में
- 2025: इसे अनिवार्य बनाने की मांगों पर नई बहस
अगला कदम? सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंच सकता है
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह विवाद लंबे समय तक चलेगा और यदि सरकार कोई नया प्रावधान लाती है, तो मामला सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का विषय बन सकता है।
समापन
ओवैसी के भाषण ने एक बार फिर भारत में राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता पर व्यापक बहस छेड़ दी है। सवाल अब यह है—
क्या भारत विविधता को संजोए रखेगा, या एकरूपता के नाम पर आस्था पर दबाव बढ़ेगा?


