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जंतर-मंतर पर ‘इलाज’ हुआ तो बदले सुर: स्टूडियो के ‘सुरमा’ ज़मीन पर क्यों नहीं उतरे?

विशेष रिपोर्ट — नई दिल्ली (वशिष्ठ वाणी):

कहावत है कि जब ज़मीन का सच चेहरे पर थप्पड़ बनकर पड़ता है, तो बड़ी-बड़ी एंकरिंग और जहरीली पटकथाएँ धरी की धरी रह जाती हैं। नीट (NEET) पेपर लीक मामले में जंतर-मंतर पर जब तक युवा शांति से अपनी बात रख रहे थे, तब तक एयर-कंडीशंड स्टूडियो में बैठकर चीखने वाले ‘राष्ट्रवादी एंकर’ देश के भविष्य को कभी ‘चीनी कनेक्शन’, तो कभी ‘पाकिस्तानी एजेंट’ और ‘दहशतगर्द’ करार दे रहे थे।

लेकिन जैसे ही आंदोलन का पारा चढ़ा और ग्राउंड पर गए रिपोर्टरों का युवाओं ने ‘अभूतपूर्व स्वागत’ किया, तो स्टूडियो में बैठे आकाओं के तोते उड़ गए। जो एंकर कल तक टीआरपी के लिए नफ़रत का ज़हर घोल रहे थे, आज वही अपनी ’15-20 साल की ईमानदारी वाली पत्रकारिता’ की दुहाई देकर कैमरे के सामने सफ़ाइयां पेश कर रहे हैं!

1. स्टूडियो के ‘सूरमा’ गायब, बेचारे रिपोर्टर बने बलि का बकरा!

जंतर-मंतर पर जो हुआ, उसने मुख्यधारा मीडिया की रीढ़ की हड्डी की असलियत देश के सामने ला दी:

  • कायरता की पराकाष्ठा: एसी कमरों में बैठकर युवाओं को राष्ट्रद्रोही बताने वाले नामचीन एंकरों में इतना दम नहीं था कि वे जंतर-मंतर जाकर छात्रों के सवालों का सामना कर सकें। उन्होंने खुद छुपकर अपने जूनियर रिपोर्टरों को ज़मीन पर झोंक दिया।
  • जनता का फूटा गुस्सा: हालाँकि किसी भी रिपोर्टर के साथ अभद्रता या धक्का-मुक्की का समर्थन नहीं किया जा सकता, लेकिन सवाल यह है कि जनता का यह गुस्सा कब तक दब कर रहता? जब दिन-रात उनकी जायज़ मांगों का मज़ाक उड़ाया जाएगा, तो सड़कों पर आक्रोश का फूटना तय था।

2. पीएम के ट्वीट से बदला ‘आकाओं’ का एजेंडा

इस पूरी क्रोनोलॉजी का सबसे हास्यास्पद पहलू यह रहा कि गोदी मीडिया का ज़मीर युवाओं के खून-पसीने से नहीं, बल्कि सत्ता के एक ट्वीट से जागा!

  • रातों-रात बदला नैरेटिव: जब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देर रात ट्वीट कर फास्ट-ट्रैक कोर्ट की बात नहीं की और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा नहीं हुआ, तब तक ये चैनल युवाओं को कोस रहे थे।
  • ट्वीट आते ही ‘युवा हितैषी’: जैसे ही ऊपर से हरी झंडी मिली, इन एंकरों के सुर रातों-रात 180 डिग्री घूम गए। जो युवा कल तक ‘उपद्रवी’ थे, वे अचानक ‘देश के भावी कर्णधार’ बन गए और प्राइम टाइम में युवाओं के हक की फर्जी चिंता का नाटक शुरू हो गया।

3. “मैं 20 साल से ईमानदार हूँ!”— सोशल मीडिया पर उड़ा मज़ाक

जब जंतर-मंतर के आक्रोश और सोशल मीडिया के बहिष्कार से चैनलों की साख (और टीआरपी) गर्त में जाने लगी, तो टीवी स्क्रीन पर अजीबो-गरीब नज़ारे देखने को मिले:

  • सफ़ाइयों का दौर: सालों से चाटुकारिता करने वाले एंकर ऑन-एयर आकर सफाई देने लगे कि “उन्होंने 15-20 सालों से ईमानदारी से पत्रकारिता की है।”
  • जनता ने लगाया आईना: जनता अब समझदार हो चुकी है। सोशल मीडिया पर इन तथाकथित एंकरों की पुरानी क्लिपों को शेयर कर उनका जमकर मज़ाक उड़ाया जा रहा है। जनता पूछ रही है कि ‘ईमानदारी’ का यह अचानक अहसास नौकरी बचाने के लिए है या साख बचाने के लिए?

गोदी मीडिया के आकाओं को अब यह बात अच्छी तरह समझ आ जानी चाहिए कि देश का युवा जाग चुका है। अगर स्टूडियो के गद्दों पर बैठकर ज़हर उगलने का सिलसिला बंद नहीं हुआ, तो जो ‘इलाज’ जंतर-मंतर पर हुआ है, वह पूरे देश के हर चौक-चौराहे पर हो सकता है।

पत्रकारिता का काम सत्ता से सवाल पूछना होता है, जनता पर भौंकना नहीं। जब-जब मीडिया सत्ता की गोदी में बैठकर देश के युवाओं के भविष्य का सौदा करेगा, तब-तब इसी तरह के ज़मीनी चाबुक से उसके सुर बदलने पर मजबूर होना पड़ेगा!

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