विशेष संवाददाता — नई दिल्ली
नीट (NEET) परीक्षा में धांधली को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर देशभर के युवाओं के उग्र प्रदर्शन और बढ़ते जनआक्रोश के बीच केंद्र सरकार को बड़ा प्रशासनिक कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देर रात संदेश जारी कर त्वरित न्याय और फास्ट-ट्रैक कोर्ट के गठन का आश्वासन दिया, जिसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सामने आया।
हालाँकि, प्रशासनिक फैसलों के इस तेज घटनाक्रम ने देश के सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में एक नया और गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि जो सरकार और शीर्ष नेतृत्व युवाओं के सीधे आंदोलन के दबाव में आकर तत्काल प्रतिक्रिया देता है, वही नेतृत्व अयोध्या स्थित राम मंदिर परिसर में सामने आए लाखों-करोड़ों रुपये के चढ़ावा चोरी के अत्यंत संवेदनशील मामले पर पूरी तरह मौन क्यों है?
आस्था का प्रश्न और प्रशासनिक जवाबदेही
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा के दौरान पारदर्शी व्यवस्था का दावा किया गया था। मंदिर परिसर की सुरक्षा और प्रशासनिक देखरेख सीधे उच्चस्तरीय ट्रस्ट एवं नियुक्त अधिकारियों के अधीन है। ऐसे में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए गए चढ़ावे में वित्तीय अनियमितता और चोरी के आरोप सामने आना सीधे तौर पर देश के करोड़ों रामभक्तों की आस्था पर आघात है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी धार्मिक और राष्ट्रीय महत्व के स्थान पर इस स्तर की गड़बड़ी के आरोप लगते हैं, तो उस पर सरकार एवं संबंधित प्रशासनिक निकायों की ओर से स्वतः संज्ञान लेकर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। जिस तत्परता के साथ परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ी पर कड़ा रुख अपनाया गया, उसी प्रकार की प्रशासनिक निष्पक्षता और जवाबदेही मंदिर के दानपात्र से जुड़ी धांधली पर भी अपेक्षित थी।
मुख्यधारा मीडिया का रुख और सामाजिक प्राथमिकताएं
घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू मुख्यधारा के मीडिया और राजनीतिक दलों का दृष्टिकोण भी है। जंतर-मंतर पर युवाओं के संगठित और बेखौफ विरोध के कारण पेपर लीक का मुद्दा लगातार राष्ट्रीय सुर्खियों में बना रहा, जिसके चलते सत्ता पक्ष को रक्षात्मक रुख अपनाना पड़ा।
इसके ठीक विपरीत, राम मंदिर चढ़ावा चोरी का मामला सार्वजनिक बहस और मुख्यधारा के प्रमुख समाचार माध्यमों से धीरे-धीरे ओझल होता दिख रहा है। जनमानस में यह धारणा बलवती हो रही है कि सामाजिक-धार्मिक मुद्दों पर जनसामान्य के बिखरे होने के कारण ऐसे संवेदनशील मामलों को प्रशासनिक स्तर पर उपेक्षित छोड़ दिया जाता है।
निष्पक्ष संपादकीय दृष्टिकोण
लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी सरकार की जवाबदेही केवल तात्कालिक राजनीतिक या प्रशासनिक दबावों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कड़े कदम उठाना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक देश के करोड़ों नागरिकों की धार्मिक आस्था से जुड़े संस्थानों में शुचिता और पारदर्शिता बनाए रखना भी है।
जब तक राम मंदिर चढ़ावा विवाद के दोषियों पर स्पष्ट जांच और कड़ी कार्रवाई नहीं होती, तब तक जनमानस में प्रशासनिक प्राथमिकताओं को लेकर सवाल उठते रहेंगे।













