
• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
इतिहास गवाह है कि सभ्यताएँ तब नहीं टूटतीं जब उन पर बाहरी आक्रमण होते हैं, सभ्यताएँ तब बिखरती हैं जब उनके भीतर ‘आस्था के सौदागर’ और ‘व्यवस्था के रक्षक’ एक होकर जनमानस के विश्वास का सौदा करने लगते हैं। अयोध्या के भव्य मंदिर में जन-जन के समर्पण से अर्पित चढ़ावे पर पड़ी ‘वैचारिक डकैती’ महज़ एक तिजोरी का खाली होना नहीं है। यह उस मूक सहमति का अंत है, जिसके तहत इस देश के आम नागरिक ने अपना सर्वस्व एक राजनीतिक नेतृत्व के हाथों में इस विश्वास के साथ सौंप दिया था कि कम से कम मर्यादा के केंद्र को तो राजनीति के प्रदूषण से मुक्त रखा जाएगा।
परंतु आज का परिदृश्य एक भयावह सत्य को उजागर करता है—जब सत्ता का अहंकार सिर चढ़कर बोलने लगता है, तो वह सबसे पहले उसी सीढ़ी को विस्मृत कर देता है जिसके दम पर उसने शीर्ष को छुआ था।
‘स्मृति का विलोपन’ और राजनीति का अंतिम सत्य
मशहूर कलाकृतियों और सिनेमाई संवादों में अक्सर व्यवस्था का वह क्रूरतम चेहरा दिखाया जाता है जो आज भारत की राजनीतिक क्रोनोलॉजी का मुख्य स्तंभ बन चुका है। सत्ता के गलियारों में बैठे रणनीतिकारों को इस बात का पूरा भरोसा है कि जनमानस की ‘स्मृति’ (Memory) अत्यंत क्षणभंगुर होती है। वे जानते हैं कि आज जो आक्रोश धधक रहा है, जो सवाल मीडिया की सुर्खियों में गूँज रहे हैं, उन्हें सिर्फ कुछ समय के लिए ‘अनदेखा’ करना है।
रणनीति साफ है—वक्त को बीतने दो, शोर को धीमा होने दो। जब चुनाव का शंखनाद होगा, तब राष्ट्रवाद, भय और धार्मिक ध्रुवीकरण का एक नया आख्यान (Narrative) रचकर उसी पीड़ित जनता को फिर से सम्मोहित कर दिया जाएगा। सवाल यह उठता है कि क्या सनातनी समाज की चेतना इतनी कमज़ोर और सुलभ समझ ली गई है कि उसे हर बार भावनाओं के भंवर में फंसाकर वैचारिक रूप से लूट लिया जाए, और वह हर बार अपनी ही लूट पर ताली बजाने को अभिशप्त हो?
वैश्विक चकाचौंध और ‘प्रधान रक्षक’ की उदासीनता
जिस कालखंड में समूचे देश के श्रद्धालु अपनी आस्था के केंद्र में हुई इस संगठित लूट से आहत हैं, उस समय सत्ता के शीर्ष पुरुष का वैश्विक यात्राओं की चकाचौंध में व्यस्त रहना और इस विषय पर एक शब्द भी न बोलना कई गहरे सवाल छोड़ जाता है। जब किसी अभियान के नायकत्व का सारा श्रेय स्वयं ओढ़ा जाता है, तो उस अभियान की विफलता और उसमें हुए पाखंड की जवाबदेही से मुंह मोड़कर केवल विदेशों की सैर करना कहाँ की नैतिकता है?
यही उदासीनता प्रांतीय शासन व्यवस्था में भी परिलक्षित होती है, जहाँ जवाब देने के बजाय अफ़सरशाही के अहंकार की आड़ में सच को दबाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। रक्षक और भक्षक के बीच की यह धुंधली रेखा आज हर उस नागरिक को कचोट रही है जो इस व्यवस्था को निष्पक्ष समझता था।
दिखावे की जांच: न्याय की आत्मा का उपहास
प्रशासनिक संहिताओं और न्यायशास्त्र का यह बुनियादी नियम है कि जिस पर उंगली उठी हो, वह कभी अपनी जांच का सूत्रधार नहीं हो सकता। परंतु इस पूरे प्रकरण में जो तथाकथित जांच का नाटक रचा गया है, वह सीधे तौर पर न्याय की आत्मा का उपहास है। जब जांच करने वाली एजेंसियां अपनी रिपोर्ट ले जाकर उन्हीं चेहरों और ट्रस्टियों को सौंपने लगें जिन पर खुद कटघरे में खड़े होने का संदेह है, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था अब सुधार के लिए नहीं, बल्कि सबूतों को दफन करने के लिए काम कर रही है। यह न्याय की स्थापना नहीं, बल्कि अपराधियों को एक ‘सुरक्षित गलियारा’ (Safe Passage) देने की कोशिश है।
जागो जनता जागो: यह अंधभक्ति की सीमा है
आज चारों ओर एक अघोषित भय और मौन का साम्राज्य है, जहाँ तंत्र की शक्ति के डर से बड़े-बड़े मंच खामोश हैं। परंतु पत्रकारिता का धर्म इस डर के आगे घुटने टेकने की अनुमति नहीं देता। ऐ देश के नागरिकों, अब तुम्हें अपनी इस वैचारिक निद्रा से जागना होगा। तुम्हें खुद से यह कड़ा सवाल पूछना होगा कि “जिसे तुमने इस राष्ट्र का और अपनी आस्था का नेतृत्व सौंपा था, जब वे ‘राम’ के सिद्धांतों और मर्यादा के न हो सके, तो वे तुम्हारे अधिकारों के क्या होंगे?”
जो सत्ता भगवान के घर में आए चढ़ावे और श्रद्धालुओं की भावनाओं को सुरक्षित नहीं रख सकती, वह तुम्हारे भविष्य, तुम्हारी सुरक्षा और तुम्हारे स्वाभिमान की रक्षा कैसे करेगी? शासक आएंगे और जाएंगे, सरकारें बनेंगी और मिटेंगी, परंतु समाज का आत्मसम्मान कभी नहीं मरना चाहिए। यदि आज भी देश की जनता इस गंदी राजनीति और धार्मिक छलावे के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद नहीं करती है, तो इतिहास हमारे इस मौन को हमारी सबसे बड़ी कायरता के रूप में दर्ज करेगा। जागो, क्योंकि तुम्हारी यह खामोशी ही इस निरंकुश तंत्र की सबसे बड़ी संजीवनी है।














