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राम मंदिर चढ़ावा विवाद: जांच या लीपापोती? ‘वशिष्ठ वाणी’ के कड़े सवाल

राम मंदिर का ‘चढ़ावा’ और सवालों के घेरे में ट्रस्ट; आस्था के नाम पर हो रहे ‘खेल’ से आहत हैं करोड़ों भक्त!

अयोध्या/लखनऊ: जिस राम मंदिर के निर्माण के लिए देश-दुनिया के लाखों राम भक्तों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, उसी पावन स्थान पर चढ़ावे (दान) में हेराफेरी की खबरें आज हर सच्चे भक्त को शर्मिंदा कर रही हैं। ‘वशिष्ठ वाणी’ किसी पर भी बिना ठोस सबूत के आरोप नहीं लगा रहा, लेकिन जो खुलासे सामने आ रहे हैं, वे मंदिर की पवित्रता और व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं।

आस्था के मंदिर में ‘अंदरूनी’ सेंधमारी

सबसे बड़ी शर्म की बात यह है कि राम मंदिर के अंदर बैठकर ही चढ़ावा गायब किया जा रहा है, और यह काम कोई बाहरी नहीं, बल्कि मंदिर की व्यवस्था से जुड़े लोग ही कर रहे हैं। मंदिर के भीतर बैठे इन जिम्मेदार लोगों को शायद यह अहसास नहीं है कि जब करोड़ों राम भक्तों को यह पता चलेगा कि उनकी आस्था के प्रतीक के साथ ऐसा खिलवाड़ हुआ है, तो उनके दिलों पर क्या बीतेगी! यह केवल दान की चोरी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं का अपमान है।

जवाबदेही से बचता ‘ट्रस्ट’

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने राम मंदिर ट्रस्ट से इस पूरे मामले पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। लेकिन खेद का विषय यह है कि ट्रस्ट ने रिपोर्ट सौंपने से इनकार कर दिया है। इस कारण, फिलहाल किसी भी प्रकार की विस्तृत रिपोर्ट उपलब्ध कराने में असमर्थता जताई गई है। ट्रस्ट का तर्क है कि SIT जांच कर रही है, इसलिए कोई जवाब नहीं दिया जाएगा। क्या यह जवाबदेही से बचने का एक बहाना है? क्या एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के बजाय SIT को ढाल बनाकर पूरे मामले को दबाने की कोशिश हो रही है?

सत्ता और जनता से ‘बेपरवाह’ राजनीति?

ऐसा लगता है कि मंदिर प्रबंधन और इससे जुड़े कुछ लोगों को यह गलतफहमी हो गई है कि जिस तरह की राजनीति देश में हावी है, उसमें अब जनता से कुछ भी लेना-देना नहीं है। उन्हें लगता है कि ‘चाहे जो करो, कोई क्या बिगाड़ लेगा?’ यह अहंकार जनता की आवाज और आस्था की शक्ति को कम आंकने की बड़ी भूल है।

CM योगी से ‘वशिष्ठ वाणी’ के तीखे सवाल

इस पूरे प्रकरण में प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। ‘वशिष्ठ वाणी’ पूछना चाहता है:

  • क्या मुख्यमंत्री जी को यह घटना ‘बड़ी’ नहीं दिख रही है?
  • जब मामला आस्था के केंद्र और करोड़ों के दान का है, तो अब तक ED या CBI जैसी केंद्रीय एजेंसियों से जांच की सिफारिश क्यों नहीं की गई?
  • केवल SIT से ही जांच क्यों करवाई जा रही है? क्या दाल में कुछ काला है, या पूरी दाल ही काली है?

निष्कर्ष

‘वशिष्ठ वाणी’ प्रशासन से मांग करता है कि जांच के नाम पर हो रहे इस ‘मजाक’ को तत्काल बंद किया जाए। क्या दोषियों को सजा मिल पाएगी या यह मामला भी फाइलों के बीच कहीं दब जाएगा?

राम भक्तों, जागें! आपकी आस्था के साथ हो रहे इस खिलवाड़ पर जवाबदेही तय करने का समय आ गया है। हम निष्पक्ष जांच की मांग करते हैं और सत्य के सामने आने तक अपनी आवाज उठाते रहेंगे।

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