मुंबई (विशेष ब्यूरो): “सत्ता और पद का दायित्व जितना बड़ा होता है, उसके साथ आने वाली विनम्रता भी उतनी ही गहरी होनी चाहिए।” लेकिन जब पद का प्रभाव जनता और मीडिया की आवाज़ को अनसुना करने लगे, तो लोकतंत्र की नींव डगमगाने लगती है। महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री पद राज्य का सबसे सर्वोच्च और शक्तिशाली पद है। आज ‘वशिष्ठ वाणी’ किसी राजनीतिक द्वेष से नहीं, बल्कि मुंबई और महाराष्ट्र की त्रस्त जनता की पीड़ा को अपने शब्दों में समेटकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से एक बेहद ठोस और नीतिगत मांग कर रही है।
क्या ‘वशिष्ठ वाणी’ का यह सपना सिर्फ सपना ही रह जाएगा?
एक सजग और निष्पक्ष मीडिया हाउस होने के नाते, हमारा हमेशा से यह सपना रहा है कि हम गर्व से अपने समाचार पत्र और वेबसाइट पर यह लिख सकें— “जब तक महाराष्ट्र की कमान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के हाथों में है, तब तक राज्य का कोई भी नागरिक परेशान नहीं रह सकता।” लेकिन आज की ज़मीनी हकीकत और प्रशासनिक उदासीनता को देखकर लगता है कि यह बात महज़ एक सपना बनकर ही रह जाएगी। अब बहुत हुआ मुख्यमंत्री जी, हर बात पर “पीएम मोदी के नेतृत्व में…” का राग अलापना अब बंद होना चाहिए। जनता ने राज्य की कमान आपको सौंपी है, इसलिए ज़िम्मेदारी और जवाबदेही भी आपकी ही बनती है।
‘वशिष्ठ वाणी’ की मुख्यमंत्री से बड़ी मांग: @CMOMaharashtra के लिए बने ‘स्पेशल ऑडिट टीम’
हम मुख्यमंत्री के सामने एक स्पष्ट मांग रख रहे हैं। हमारी मांग है कि:
- मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के भीतर एक ‘स्पेशल डिजिटल टास्क फोर्स’ बनाई जाए जो सीधे मुख्यमंत्री की निगरानी में काम करे।
- इस टीम का एकमात्र काम @CMOMaharashtra पर जनता और मीडिया द्वारा पुख्ता सबूतों के साथ किए गए टैग्स और शिकायतों की छंटनी करना हो।
- शिकायतों की जांच कर २४ घंटे के भीतर संबंधित विभाग के लापरवाह अधिकारियों को एक्शन टेकेन रिपोर्ट (ATR) सौंपने का नियम अनिवार्य किया जाए।
ट्विटर पर आपकी एक ‘नज़र’ और अधिकारियों का ढर्रा सुधर जाएगा!
‘वशिष्ठ वाणी’ का यह दृढ़ विश्वास है कि प्रशासनिक सुधार के लिए किसी बड़े आंदोलन की ज़रूरत नहीं है, बल्कि सिर्फ आपकी एक दृढ़ इच्छाशक्ति ही काफी है। जिस दिन आपने और आपकी टीम ने सोशल मीडिया पर आने वाले जनता के टैग्स को गंभीरता से सुनना और उन पर लाइव एक्शन लेना शुरू कर दिया, उसी दिन:
- दफ़्तरों में कुंडली मारकर बैठे अधिकारी सीधे रास्ते पर आ जाएंगे।
- मंत्रियों के संरक्षण का दावा करने वाले भ्रष्ट अफसरों के मन में कानून का खौफ़ पैदा हो जाएगा।
- अपनी कुर्सी से उठने को तैयार न रहने वाले अधिकारी खुद ज़मीन पर उतरकर काम करने को मजबूर हो जाएंगे।
चाहे आप हों या कोई और… डिजिटल जवाबदेही का नियम बनना ही चाहिए
शायद सत्ता और पद का रसूख ऐसा होता है कि एक छोटे और खोजी मीडिया का यह सुझाव सरकार को रास न आए। लेकिन ‘वशिष्ठ वाणी’ उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार कर रही है जब यह व्यवस्था बदलेगी। हमारा मानना है कि आज देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री हैं, कल कोई और होगा— लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय के लिए यह नियम अनिवार्य होना चाहिए कि सोशल मीडिया पर आने वाली प्रमाणित शिकायतों का एक निश्चित समय सीमा के भीतर निपटारा हो।
‘वशिष्ठ वाणी’ का अंतिम संदेश: मुख्यमंत्री जी, मुंबई की जनता अवैध निर्माणों, ट्रैफिक, फुटपाथों पर कब्ज़े और सरकारी दफ्तरों की चक्करबाजी से पूरी तरह थक चुकी है। अधिकारी कार्रवाई के नाम पर फाइलें दबाकर बैठे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उनके मंत्रियों का हाथ उनके सिर पर है। अगर आप हमारे इस सुझाव को पास कर देते हैं, तो यह न केवल जनता के अधिकारों की जीत होगी, बल्कि इतिहास में आपकी छवि एक ‘जन-नायक’ के रूप में दर्ज हो जाएगी। अब फैसला आपके हाथ में है— आप केवल विज्ञापनों के मुख्यमंत्री बने रहना चाहते हैं या जनता के दिलों के?











