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‘वशिष्ठ वाणी’ महा-खुलासा: डिप्टी कलेक्टर विनायक पाडवी की 2 दिन की चेतावनी भी रही बेअसर! क्या नेहा वालावलकर को मिलेगा रास्ता या सिर्फ बयानों में सिमट कर रह जाएगा इंसाफ?

मुंबई | मालाड (पश्चिम) | खोजी रिपोर्ट

प्रशासनिक चेतावनियों को ठेंगे पर रखने वाले दबंगों के हौसले कितने बुलंद हैं, इसकी बानगी मालाड पश्चिम के एरंगळ गांव में साफ देखने को मिल रही है। दो दिन पहले जब गोरेगांव के डिप्टी कलेक्टर (उपजिलाधिकारी) विनायक पाडवी खुद ग्राउंड जीरो पर पहुंचे थे, तो पीड़ित महिला अधिकारी और स्थानीय जनता की उम्मीदें जाग उठी थीं। पाडवी जी ने दबंगों को दो टूक लहजे में 48 घंटे (2 दिन) का अल्टीमेटम दिया था कि या तो खुद अवैध दीवार हटाकर रास्ता खोल दें, अन्यथा बीएमसी (BMC) का बुलडोजर गरजेगा।

लेकिन आज दो दिन का समय बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। दबंगों ने प्रशासन की चेतावनी को हवा में उड़ा दिया है और रास्ता अब भी पूरी तरह ब्लॉक है।


क्या सिर्फ कागजी शेर साबित होगी प्रशासनिक चेतावनी?

‘वशिष्ठ वाणी’ के ग्राउंड रियलिटी चेक में यह हैरान करने वाला सच सामने आया है कि डिप्टी कलेक्टर की सख्त हिदायत का रसूखदारों पर कोई असर नहीं हुआ। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है:

  • क्या गोरेगांव डिप्टी कलेक्टर विनायक पाडवी अपने वादे के मुताबिक अब कोई बड़ी और दंडात्मक कार्रवाई करेंगे?
  • क्या कानून का इकबाल बुलंद करने के लिए मौके पर भारी पुलिस बल और बीएमसी के दस्ते के साथ हथौड़ा चलाया जाएगा?
  • या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह सिर्फ ‘तारीख पर तारीख’ और खोखली चेतावनियों के फेर में उलझकर रह जाएगा?

बरसात सिर पर, खुले तारों के बीच से गुजरने को मजबूर पीड़ित परिवार!

आपको याद दिला दें कि योगाश्रम, बुल्लर गार्डन, एरंगळ विलेज, दाणापाणी, मालाड (प.), मुंबई-400061 में रहने वाली पीड़ित नेहा निलेश वालावलकर पिछले कई महीनों से अपने ही घर से बाहर निकलने के हक (राइट टू वे) के लिए सिस्टम के आगे गुहार लगा रही हैं। दबंगई का आलम यह था कि मुख्य रास्ता बंद होने के कारण उन्हें एक साल तक किराए के मकान में भटकना पड़ा था।

अब जब मानसून (मुंबई की भारी बारिश) दस्तक दे चुका है, तब रास्ता बंद होने के कारण स्थिति और भयानक हो गई है। अगर प्रशासन ने तुरंत एक्शन लेकर दीवार को ध्वस्त नहीं किया, तो इस कड़कड़ाती बिजली और मूसलाधार बरसात में पीड़ित महिला को खुले और लटकते हुए बिजली के तारों के बीच से जान जोखिम में डालकर अपने घर से बाहर निकलना होगा। किसी अनहोनी की स्थिति में इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? गोरेगांव कलेक्टर ऑफिस की या बीएमसी की?


‘वशिष्ठ वाणी’ का सीधा सवाल: अब कब चलेगा प्रशासन का चाबुक?

जब प्रशासन में विनायक पाडवी जैसे संवेदनशील अधिकारी खुद मौके पर आते हैं, तो जनता की उम्मीदें 100 गुना बढ़ जाती हैं। लेकिन जब उनके आदेशों की भी सरेआम धज्जियां उड़ाई जाएं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र को दी गई खुली चुनौती है।

नेहा निलेश वालावलकर को न्याय दिलाने के लिए ‘वशिष्ठ वाणी’ इस मुद्दे पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है। देखना यह है कि अगले 24 घंटों के भीतर डिप्टी कलेक्टर पाडवी इस अवमानना पर क्या कड़ा रुख अख्तियार करते हैं और बीएमसी का बुलडोजर इन दबंगों की अवैध दीवार पर कब गरजता है!

हमारी रिपोर्टिंग तब तक जारी रहेगी, जब तक पीड़ित को उनका हक और रास्ता नहीं मिल जाता!

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