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बूंदी (राजस्थान) के पीड़ित परिवार की चीख— “हमें न्याय चाहिए, तंत्र का अत्याचार नहीं!”

क्या इस देश में आम आदमी सिर्फ पिसने के लिए पैदा हुआ है?

• रूह कंपा देने वाली विशेष ग्राउंड रिपोर्ट: वशिष्ठ वाणी •

बूंदी (राजस्थान)। भारत के संविधान में लिखा है कि कानून सबके लिए बराबर है। लेकिन ज़मीनी हकीकत इस मुगालते को हर दिन तार-तार करती है। जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में नजर आने लगें और पीड़ित ही न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाए, तो रूह कांप उठती है। यह खौफनाक दास्तान राजस्थान के बूंदी जिले की है, जो चीख-चीखकर गवाही दे रही है कि आज के दौर में आम जनता के साथ खड़ा होने वाला कोई नहीं है। तंत्र अंधा, बहरा और गूंगा हो चुका है।

मामूली विवाद… और पूरे परिवार पर बर्बरता की इंतहा

शिकायतकर्ता के अनुसार, यह खौफनाक सिलसिला तब शुरू हुआ जब घर के सामने सड़क पर पड़ी गिट्टियों को लेकर एक मामूली सा विवाद हुआ। लेकिन दबंगई और रसूख के नशे में चूर हमलावरों ने देखते ही देखते इसे एक हिंसक तांडव में बदल दिया। आरोप है कि पूरे परिवार को घेरकर बेरहमी से पीटा गया। इंसाफ की उम्मीद में बैठी मां, बेबस बहन और निहत्थे भाई… किसी को भी नहीं बख्शा गया। चीखें गूंजती रहीं, लेकिन बेरहम दिल नहीं पसीजे।

खाकी पर दाग: जब रक्षक ही मिटाने लगे सबूत!

मारपीट से टूटा परिवार जब लहूलुहान हालत में न्याय की आस लेकर थाने पहुंचा, तो वहां जो हुआ उसने कानून व्यवस्था के जनाजे पर मुहर लगा दी। पीड़ित परिवार का आरोप है कि पुलिस ने उनके बयानों को तोड़-मरोड़ कर दर्ज किया ताकि दोषियों को बचाया जा सके।

‘वशिष्ठ वाणी’ के पास मौजूद वीडियो फुटेज तंत्र की क्रूरता की गवाही दे रहे हैं:

  • वीडियो 1: एक रसूखदार अधिकारी कथित तौर पर सच को दबाने के लिए वीडियो बना रहे व्यक्ति पर झपटता है, उसका मोबाइल छीनता है और सबूत (रिकॉर्डिंग) मिटाने की बर्बर कोशिश करता है।
  • वीडियो 2: एक महिला पुलिसकर्मी द्वारा एक बेबस महिला को जानवरों की तरह घसीटकर ले जाने का विचलित करने वाला दृश्य साफ दिखाई दे रहा है।

सवाल उठता है: जो खाकी कमजोरों की ढाल होनी चाहिए थी, क्या वह अब रसूखदारों के इशारे पर पीड़ितों की आवाज दबाने का हथियार बन चुकी है?


7 दिसंबर 2025 से आज तक… सिर्फ तारीखें मिलीं, इंसाफ नहीं!

यह घटना 7 दिसंबर 2025 की है। तब से लेकर आज तक, महीनों बीत गए, लेकिन इस पीड़ित परिवार के हिस्से आई तो सिर्फ प्रशासनिक उपेक्षा, मानसिक प्रताड़ना और सामाजिक तिरस्कार। जब हर दरवाजा बंद हो गया, तब इस टूट चुके परिवार ने ‘वशिष्ठ वाणी’ की जनहित की पत्रकारिता पर भरोसा जताते हुए अपनी पीड़ा साझा की।

यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, यह उस हर आम नागरिक का सच है जिसके पास न तो राजनीतिक रसूख है, न ही तिजोरियों में बंद पैसा। अदालत के चक्कर और प्रशासनिक लात-घूंसे आम आदमी को जीते जी मार देते हैं।


‘वशिष्ठ वाणी’ की सीधे हुक्मरानों से मांग

‘वशिष्ठ वाणी’ किसी को सीधे दोषी नहीं ठहराता, लेकिन इस बेबसी को देखकर हम चुप भी नहीं बैठ सकते। हम राजस्थान सरकार और आला अधिकारियों से सीधे ये सवाल करते हैं:

  1. निष्पक्ष जांच कब?: राजस्थान सरकार तुरंत इस मामले को संज्ञान में लेकर उपलब्ध वीडियो साक्ष्यों की फोरेंसिक और निष्पक्ष जांच कराए।
  2. वर्दी का दुरुपयोग करने वालों पर एक्शन हो: वीडियो में मोबाइल छीनने वाले अधिकारी और महिला को घसीटने वाली पुलिसकर्मी पर तुरंत कार्रवाई की जाए।
  3. सुरक्षा और न्याय: पीड़ित परिवार को दबंगों और भ्रष्ट तंत्र से तुरंत सुरक्षा मुहैया कराई जाए।

लोकतंत्र का कड़वा सच: अगर इस देश में सबसे कमजोर और असहाय व्यक्ति को न्याय के लिए महीनों तक तड़पना पड़े, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र सिर्फ किताबों में बचा है। उम्मीद है कि राजस्थान सरकार के जिम्मेदार हुक्मरान अपनी कुंभकर्णी नींद से जागेंगे और इस पीड़ित परिवार को इंसाफ देकर यह साबित करेंगे कि कानून अभी जिंदा है।

— जनहित में जारी, सिर्फ ‘वशिष्ठ वाणी’ पर।

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