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सत्ता का अहंकार, दमन का दौर और लोकतंत्र का शाश्वत चक्र

लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ • (वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)


भारतीय लोकतंत्र का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि सत्ता जब-जब जनादेश के भारी बहुमत को अपनी प्राथमिकताओं की अंतिम मुहर समझ लेती है, तब-तब उसके भीतर एक विशेष प्रकार का संस्थागत अहंकार आकार लेने लगता है। जब शासन का ध्यान ‘जन-आकांक्षाओं की पूर्ति’ से हटकर ‘नियंत्रण और दमन’ पर केंद्रित हो जाता है, तो लोकतंत्र अपनी सबसे संवेदनशील स्थिति में पहुँच जाता है। हाल में 10 अक्टूबर को राजधानी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव आयोग में सुधारों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे युवाओं, छात्रों और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रति केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस का जो प्रशासनिक रवैया देखने को मिला, वह इसी अहंकार और अदूरदर्शिता की एक मिसाल है।

ज्ञानेश कुमार, CJP का आंदोलन और प्रशासनिक बल प्रयोग

10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘जेन-जी’ (Gen-Z) और युवाओं के बड़े जमावड़े को रोकने के लिए जिस प्रकार दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती की गई, सीमाओं पर नाकेबंदी हुई और पत्रकारों तक को कवरेज करने से रोककर डिटेन किया गया, उसने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उठ रही आवाज़ें और वोटर लिस्ट में कथित धांधली को लेकर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) द्वारा शुरू किया गया यह आंदोलन अगर शांतिपूर्ण तरीके से होने दिया जाता, तो शायद यह एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनकर सीमित रहता। लेकिन केंद्र सरकार की शह पर दिल्ली पुलिस ने जिस तरह सड़कों पर बल प्रयोग किया और युवाओं की आवाज़ दबाने की कोशिश की, उससे ऐसा प्रतीत होता है मानो सरकार खुद अपने हाथों इस नए राजनीतिक संगठन और आंदोलन को बड़ा मंच और नैतिक ताकत दे रही है।

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं?

2014 में जब नरेंद्र मोदी ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा लेकर सत्ता में आए थे, तब देश की जनता और युवाओं ने उन पर एक अटूट विश्वास जताया था। लेकिन 10 वर्षों के शासन के बाद राजनीतिक कार्यशैली पर यह सवाल गहराता जा रहा है कि क्या प्रधानमंत्री की रणनीतियाँ खुद उन्हीं के राजनीतिक भविष्य के लिए घातक सिद्ध हो रही हैं?

  • अहंकार और संवादहीनता: जनता से ‘मन की बात’ करने वाले प्रधानमंत्री के कार्यकाल में जब युवाओं की सुनने की बात आती है, तो पुलिस की लाठियों और पाबंदियों से जवाब दिया जाता है।
  • चुनिंदा विकास और ‘वॉशिंग मशीन’ की छवि: ‘सबका विकास’ का दावा अब कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों के विकास तक सिमटता दिखा है। वहीं, जिन नेताओं पर प्रधानमंत्री खुद चुनाव प्रचार में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते थे, वे जैसे ही बीजेपी में शामिल होते हैं, ED, CBI और आयकर विभाग की जाँचें गायब हो जाती हैं।
  • नीतियों की नाकामी और मौन: नोटबंदी जैसे बड़े फैसलों से आम जनता को मिले दुखों का शून्य परिणाम हो, या फिर हाल में राम मंदिर जैसी पवित्र व्यवस्थाओं से जुड़ी गड़बड़ियों पर एक शब्द न बोलने का मौन—यह सब दर्शाता है कि सत्ता अब जन-आकांक्षाओं के प्रति जवाबदेह होने के बजाय एकतरफा हनक में जी रही है।

UPA-2 से सीख: एक नए राजनीतिक विकल्प का जन्म

इतिहास से न सीखने वाली सत्ताएँ हमेशा एक ही भूल दोहराती हैं। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA-2 सरकार के दौर में जब भ्रष्टाचार-विरोधी जन-आक्रोश उभरा था, तब कांग्रेस सरकार ने भी सत्ता के अहंकार में उसे प्रशासनिक ताकत से दबाने का प्रयास किया था। उसका परिणाम यह हुआ कि उस आंदोलन की कोख से ‘आम आदमी पार्टी’ का जन्म हुआ, जिसने कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया।

आज जब बीजेपी सरकार CJP और ‘जेन-जी’ युवाओं के आंदोलन को रोकने के लिए अभूतपूर्व पाबंदियाँ लगा रही है, तो वह अनजाने में उसी इतिहास की पुनरावृत्ति कर रही है। जब किसी छोटे या नए संगठन को रोकने के लिए सरकार हजारों पुलिसकर्मियों को सड़क पर उतार देती है, तो जनता की नज़र में वह संगठन एक बड़ा और साहसी विकल्प बनकर उभरने लगता है।

निष्कर्ष: इतिहास दोहराने की दहलीज पर

लोकतंत्र में जनता और युवाओं का धैर्य असीम होता है, लेकिन जब उन्हें लगता है कि निष्पक्ष चुनाव, संस्थाओं की साख और उनके संवैधानिक अधिकारों को दबाया जा रहा है, तो असंतोष का यह गुबार केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहता।

यदि समय रहते केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने अहंकार को किनारे रखकर युवाओं की माँगों पर ध्यान नहीं दिया और प्रशासनिक दमन का रास्ता नहीं छोड़ा, तो यह स्पष्ट है कि वे खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं—और इसी दमनकारी रवैये के बीच एक नई राजनीतिक शक्ति की नींव मजबूत हो रही है।

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