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जंतर-मंतर प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री मोदी का संदेश: “गालियां नहीं, मार्गदर्शन समाधान है”

नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट

31 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जंतर-मंतर पर परीक्षा पेपर लीक के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान कुछ युवाओं द्वारा उनके तथा उनकी दिवंगत माता के लिए की गई अभद्र और आपत्तिजनक भाषा पर प्रतिक्रिया दी। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि “गालियां किसी समस्या का समाधान नहीं हैं।” उन्होंने समाज से अपील की कि भटके हुए युवाओं को केवल दंडित करने या कोर्ट-कचहरी में घसीटने के बजाय उन्हें सही मार्ग दिखाया जाए और उन्हें सुधारने का अवसर दिया जाए।

प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसे युवाओं को “भटके हुए बच्चे” समझकर उन्हें सही दिशा देने की आवश्यकता है, ताकि वे देश निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभा सकें। उन्होंने समाज से क्षमा, संवाद और मार्गदर्शन की भावना अपनाने का आग्रह किया।

क्या है पूरा मामला?

देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक की घटनाओं को लेकर युवाओं में लंबे समय से असंतोष देखा जा रहा है। इसी मुद्दे पर नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन आयोजित किया गया था। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी स्वर्गीय माता के लिए अपमानजनक और अशोभनीय भाषा का प्रयोग किया गया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से वायरल हुआ। इसके बाद इस घटना पर देशभर में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं।

असहमति लोकतंत्र की ताकत है, अभद्रता नहीं

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना, विरोध करना और अपनी नाराज़गी व्यक्त करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्तिगत गाली-गलौज, विशेषकर किसी के दिवंगत परिजनों के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग, न तो उचित है और न ही लोकतांत्रिक संस्कृति के अनुरूप।

यदि कोई नागरिक या युवा सरकार की नीतियों से असहमत है, तो उसे संविधान और कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रखनी चाहिए। विरोध का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसकी भाषा और मर्यादा भी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

हमारा मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कई नीतियों, निर्णयों और वादों को लेकर देश के अनेक नागरिकों की तरह हमारे भी गंभीर प्रश्न और असहमति हो सकती है। उदाहरण के तौर पर—

  • “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा” जैसे भ्रष्टाचार विरोधी वादों पर उठते सवाल।
  • विभिन्न विवादों और जनहित के मुद्दों पर सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर असंतोष।
  • विपक्ष से जुड़े कुछ नेताओं के बाद में सत्तारूढ़ दल में शामिल होने पर उठे राजनीतिक प्रश्न।
  • “मन की बात” के साथ-साथ जनता की शिकायतों और संवाद को लेकर लोगों की अपेक्षाएं।
  • छोटे और स्वतंत्र मीडिया संस्थानों के सामने बढ़ती चुनौतियों और नीतिगत चिंताएं।

इन विषयों पर आलोचना, व्यंग्य, प्रश्न और तथ्य आधारित बहस पूरी तरह लोकतांत्रिक अधिकार हैं। लेकिन किसी भी परिस्थिति में अपमानजनक या अश्लील भाषा का प्रयोग उचित नहीं ठहराया जा सकता।

प्रधानमंत्री केवल एक राजनीतिक व्यक्ति नहीं, बल्कि भारत के संवैधानिक पद पर आसीन देश के प्रधानमंत्री हैं। उनके प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग केवल व्यक्तिगत मर्यादा का उल्लंघन नहीं, बल्कि विश्व पटल पर भारत की लोकतांत्रिक संस्कृति और युवाओं की छवि को भी प्रभावित करता है।

असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन मर्यादा उसकी पहचान है। अपनी नाराज़गी तथ्यों, तर्कों और संवैधानिक तरीकों से व्यक्त करना ही एक जागरूक नागरिक की पहचान है। यदि व्यवस्था से शिकायत है, तो उसका समाधान संवाद, जनआंदोलन, न्यायिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक विमर्श के माध्यम से खोजा जाना चाहिए, न कि गाली-गलौज और व्यक्तिगत अपमान के माध्यम से।

— वशिष्ठ वाणी

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