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आस्था के नाम पर सबसे बड़ा ‘स्कैम: क्या अब भी जागेंगे आप या लुटते रहेंगे?

अयोध्या: अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे के नाम पर जो महा-घोटाला सामने आया है, उसने न केवल आस्था की नींव को हिला दिया है, बल्कि देश के ‘न्याय तंत्र’ पर भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। ‘वशिष्ठ वाणी’ आज आपसे सवाल करती है: क्या देश में कानून की परिभाषा सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों की सुविधा के अनुसार बदल जाती है?

FIR क्यों नहीं? क्या यही है भाजपा का ‘जीरो टॉलरेंस’?

मामला सामने आए इतना समय बीत चुका है, करोड़ों के हेरफेर के प्रमाण SIT के सामने आ चुके हैं, फिर भी अब तक किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति पर FIR दर्ज क्यों नहीं हुई? क्या इसका सीधा अर्थ यह निकाला जाए कि ये ‘धर्म के व्यापारी’ सत्ताधारी दल (भाजपा) के करीबी और चहेते हैं? अगर यही अपराध किसी सामान्य नागरिक या विपक्ष से जुड़े व्यक्ति ने किया होता, तो अब तक उसकी संपत्ति कुर्क हो चुकी होती और जेल की सलाखें उसे नसीब हो चुकी होतीं। लेकिन यहाँ, जांच के नाम पर केवल समय बर्बाद किया जा रहा है।

ED, CBI और आयकर विभाग कहाँ सोए हैं?

यह सवाल भी लाजमी है कि देश की बड़ी जांच एजेंसियां—ED, CBI और आयकर विभाग—जिन्हें भ्रष्टाचार की गंध आते ही कार्रवाई करनी चाहिए, आज गहरी नींद में क्यों हैं? क्या उनकी सक्रियता केवल विपक्ष के नेताओं को फंसाने तक ही सीमित है? जब मामला ‘राम मंदिर’ और ‘सत्ता के चहेतों’ से जुड़ा होता है, तो ये एजेंसियां अदृश्य क्यों हो जाती हैं? क्या इसलिए कि इन ‘धर्म के व्यापारियों’ को भाजपा के बड़े मंत्रियों का अभयदान प्राप्त है?

वशिष्ठ वाणी का सीधा प्रहार

हम किसी को दोषी नहीं ठहरा रहे, लेकिन हम यह पूछने का अधिकार रखते हैं कि कानून का तरीका बदल क्यों जाता है? * जब चोर सत्ता का चहेता होता है, तो पहले ‘जांच’ का नाटक होता है।

  • जब चोर आम आदमी होता है, तो पहले ‘गिरफ्तारी’ और ‘बदनामी’ होती है।

यह दोहरा मापदंड इस देश के लोकतंत्र के लिए घातक है। SIT की जांच महज एक ‘आईवॉश’ (दिखावा) बनकर रह गई है।

अब तक क्या हुआ है? (संक्षिप्त रिपोर्ट)

  • खुलासा: दान पेटियों से लेकर मंदिर के कीमती सामानों के प्रबंधन तक में गंभीर विसंगतियां मिलीं।
  • SIT का गठन: विवाद बढ़ने पर सरकार ने 14 जून 2026 को SIT का गठन किया, लेकिन कार्रवाई के नाम पर अब तक केवल फाइलों का आदान-प्रदान हो रहा है।
  • सुरक्षा में सेंध: सीसीटीवी फुटेज से छेड़छाड़ और सुरक्षाकर्मियों की मिलीभगत की खबरें सामने आईं, जो एक सोची-समझी साजिश की ओर इशारा करती हैं।
  • विपक्ष का रुख: अखिलेश यादव ने इस पर सरकार की चुप्पी को शर्मनाक बताया है, लेकिन सत्ताधारी खेमा अभी भी बचाव की मुद्रा में है।

अंतिम चेतावनी

राम के नाम पर अपनी जेबें भरने वालों, याद रखना—जनता अब सब देख रही है। वशिष्ठ वाणी की यह मुहिम तब तक नहीं थमेगी जब तक उन लोगों के चेहरे बेनकाब न हो जाएं जो अपनी राजनीतिक पहुंच के दम पर कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं।

अगर आपमें तनिक भी नैतिकता बची है, तो जांच को सार्वजनिक करें और दोषियों को सलाखों के पीछे भेजें। वरना, जनता का न्याय जब होगा, तो ये ‘धर्म के व्यापारी’ कहीं छिपने लायक भी नहीं रहेंगे।

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