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‘सतीश राउत’ का कांदिवली मॉडल: यहाँ सड़क सुरक्षा नहीं, बल्कि ‘अवैध वसूली’ का मीटर चलता है?

कांदिवली/चारकोप: क्या कांदिवली और चारकोप के सिग्नल अब केवल यातायात को नियंत्रित करने के लिए हैं, या इन्हें RTO अधिकारी सतीश राउत की मेहरबानी से ‘अवैध पार्किंग के अड्डों’ में बदल दिया गया है? चारकोप सिग्नल की वर्तमान स्थिति इस बात का जीता-जागता सबूत है कि यहाँ कानून का कोई भय नहीं बचा है।


कार्रवाई के नाम पर जनता की आंखों में धूल

हैरानी की बात यह है कि सतीश राउत के विभाग द्वारा की गई तथाकथित ‘कार्रवाई’ के बाद भी ज़मीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं आया। न एक वाहन हटा, न ही सड़क खाली हुई। सवाल यह उठता है कि क्या यह कार्रवाई थी या केवल जनता को गुमराह करने का एक सोची-समझी साजिश? जब मीडिया सबूतों के साथ बदहाली दिखा रहा है, तब भी अधिकारी का कोई असर न होना, उनकी कार्यप्रणाली पर गहरा संदेह पैदा करता है।


‘अकर्मण्यता’ का इनाम—प्रमोशन?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल रहा हो और जिसे जनता व मीडिया की समस्याओं से कोई सरोकार न हो, उसे ‘प्रमोशन’ देने की बात क्यों हो रही है? क्या मुंबई में अब ईमानदार काम के बजाय ‘अवैध कमाई’ और ‘अतिक्रमणकारियों के संरक्षण’ को प्रमोशन का मापदंड मान लिया गया है?

वशिष्ठ वाणी का सीधा प्रहार

‘वशिष्ठ वाणी’ यह पूछने पर मजबूर है कि:

  • क्या सतीश राउत की मेहरबानी का फायदा उठाने वाले अवैध वाहन मालिकों और अधिकारी के बीच कोई गहरा रिश्ता है?
  • क्या कांदिवली की जनता की सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण सतीश राउत का करियर और उनका ‘प्रमोशन’ है?
  • वरिष्ठ अधिकारी चुप क्यों हैं? क्या वे भी इस भ्रष्टाचार की ‘मलाई’ का हिस्सा हैं?

कांदिवली और चारकोप की जनता अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होगी। समय आ गया है कि इन लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और उन्हें पद से हटाया जाए। यदि प्रशासन ने अपनी आंखें नहीं खोलीं, तो यह सवाल सड़कों पर उतरेगा।

वशिष्ठ वाणी—जब तक न्याय नहीं, तब तक सवाल जारी रहेंगे!

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