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‘कांचपाड़ा सिग्नल’ पर BMC की आंखों में मोतियाबिंद या सत्ता का खौफ? नगरसेवक की फोटो देख ठिठक गया प्रशासन का दस्ता!

मलाड (मुंबई): प्रशासन की कार्रवाई जब ‘चेहरा’ देखकर होने लगे, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र की रीढ़ कमजोर हो चुकी है। मलाड के कांचपाड़ा सिग्नल पर हाल ही में बीएमसी (BMC) ने अवैध बैनरों के खिलाफ दिखावे की कार्रवाई तो की, लेकिन एक खास बैनर ने सिस्टम की पोल खोल दी है।

वशिष्ठ वाणी की ग्राउंड रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि बीएमसी के दस्ते ने आसपास के छोटे-मोटे बैनर तो हटा दिए, लेकिन ठीक ट्रैफिक सिग्नल की लाइट के ऊपर लगा वह बैनर उन्हें ‘दिखाई’ नहीं दिया, जिस पर बीजेपी (BJP) के नगरसेवकों की तस्वीरें चमक रही हैं।

सिस्टम के सामने तीन बड़े सवाल:

  1. क्या सत्ता का बैनर कानून से ऊपर है? बीएमसी का दस्ता जब कांचपाड़ा पहुंचा, तो क्या उनकी नजर उस सिग्नल लाइट पर नहीं पड़ी जिसे बैनर ने पूरी तरह ढक रखा है? या फिर नगरसेवक की फोटो देखते ही नियम-कायदों की फाइल बंद कर दी गई?
  2. प्रचार के लिए सिग्नल ही क्यों? क्या मंत्रियों और नगरसेवकों के पास जनता तक पहुंचने के लिए कोई और सभ्य तरीका नहीं बचा है? सिग्नल पर बैनर लगाना न सिर्फ अवैध है, बल्कि यह वाहन चालकों की जान से खिलवाड़ है। अगर कोई दुर्घटना होती है, तो क्या ये नेता जिम्मेदारी लेंगे?
  3. कानून का पालन कौन करेगा? जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और जनप्रतिनिधि ही सरेआम कानून तोड़ें, तो आम जनता से अनुशासन की उम्मीद कैसे की जा सकती है? आज हर कोई खुद को किसी न किसी नेता का ‘खास’ बताकर कानून तोड़ने को अपना अधिकार समझने लगा है।

खूबसूरत मलाड या बैनर वाला मलाड?
नेताओं को समझना होगा कि मलाड को ‘खूबसूरत’ बनाने का योगदान उनके बड़े-बड़े पोस्टरों से नहीं, बल्कि उनके द्वारा कानून के पालन से आएगा। जिस दिन नेता अपनी तस्वीरों के मोह से ऊपर उठकर सड़क के नियमों का सम्मान करने लगेंगे, सुधार उसी दिन से शुरू हो जाएगा।

बीएमसी के अधिकारियों को अब यह साफ करना होगा कि वे जनता के टैक्स से मिलने वाली सैलरी के प्रति वफादार हैं या सिर्फ सत्ताधारी नेताओं की ‘जी-हजूरी’ करने के लिए तैनात हैं।

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