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‘वशिष्ठ वाणी’ के खुलासे के बाद बैकफुट पर प्रशासन; DOTOM बिल्डर की चालाकी उजागर, पुलिस को गुमराह कर जारी रखा अवैध काम

मुंबई: कानून का डर किसे कहते हैं, शायद DOTOM डेवलपर इसे भूल चुका है। लेकिन ‘वशिष्ठ वाणी’ की टीम ने यह साबित कर दिया कि सजग पत्रकारिता के सामने बड़े से बड़े रसूखदार को झुकना पड़ता है। जनकल्याण नगर (मलाड वेस्ट) में BMC के ‘Stop Work Notice’ की धज्जियां उड़ाते हुए जब बिल्डर ने देर रात काम जारी रखा और पुलिस को दिनभर गुमराह किया, तो ‘वशिष्ठ वाणी’ के हस्तक्षेप ने प्रशासन को कार्रवाई के लिए मजबूर कर दिया।

अनुमति के नाम पर बोला सफेद झूठ

पूरा मामला तब गरमाया जब वशिष्ठ वाणी (Vashishtha Vani) की टीम ने अवैध निर्माण की शिकायत 100 नंबर पर दर्ज कराई। चरकोप पुलिस जब जांच के लिए साइट पर पहुंची, तो डेवलपर के प्रतिनिधियों ने दावा किया कि उनके पास काम जारी रखने की वैध अनुमति है। पुलिस को दिनभर इसी भ्रम में रखा गया।

दस्तावेज मांगने पर खुली पोल

मामले की गंभीरता को देखते हुए जब वशिष्ठ वाणी की टीम ने पुलिस को दोबारा तथ्यों से अवगत कराया, तब चरकोप पुलिस ने सख्त रुख अपनाते हुए बिल्डर से अनुमति के दस्तावेज मांगे। घंटों तक पुलिस को टालने वाले डेवलपर के पास दिखाने के लिए कोई भी वैध प्रमाण नहीं था। आखिरकार, पुलिस को हस्तक्षेप कर काम बंद करवाना पड़ा।

प्रशासनिक तंत्र पर उठते बड़े सवाल:

इस पूरी घटना ने सिस्टम की खामियों को उजागर कर दिया है:

  1. धोखाधड़ी का मामला: सरकारी आदेश (Stop Work Notice) का उल्लंघन करना और पुलिस को गलत जानकारी देना क्या अपराध नहीं है?
  2. BMC की निगरानी पर सवाल: नोटिस जारी करने के बाद BMC के अधिकारी यह सुनिश्चित क्यों नहीं कर रहे कि जमीन पर काम रुका है या नहीं?
  3. SRA की भूमिका: क्या इस पूरे खेल में SRA और संबंधित विभागों के बीच समन्वय की कमी है, जिसका फायदा बिल्डर उठा रहा है?

कार्रवाई की मांग

स्थानीय निवासियों और सजग नागरिकों का सवाल है कि क्या चरकोप पुलिस और BMC इस ‘सुनियोजित धोखे’ के लिए DOTOM डेवलपर पर कड़ी कानूनी कार्रवाई करेंगे? क्या पुलिस को गुमराह करने के आरोप में FIR दर्ज होगी, या फिर इसे एक सामान्य उल्लंघन मानकर छोड़ दिया जाएगा?

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