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विशेष रिपोर्ट: सत्ता का ‘अहंकार’ या तंत्र की निरंकुशता? जब सड़कों पर बहता है युवाओं का ख़ून और मूकदर्शक बनी रहती है सरकार!

— वशिष्ठ वाणी एक्सक्लूसिव (विशेष विश्लेषण)

नई दिल्ली: लोकतंत्र का पहला और मूल सिद्धांत है—“जनता के प्रति अंतिम जवाबदेही।” लेकिन जब प्रशासनिक तंत्र और सत्ता में बैठे लोग जनता के प्रति जवाबदेह होने के बजाय अपनी जिद्द, प्रोटोकॉल और राजनीतिक रणनीतियों में उलझ जाएँ, तो इतिहास उसे सत्ता का ‘अहंकार’ ही कहता है।

आज देश का युवा पेपर लीक, बर्बाद होते भविष्य और आत्महत्या के कगार पर पहुँच चुकी मानसिक पीड़ा को लेकर सड़कों पर है। लेकिन सवाल यह है कि क्या लगातार सत्ता में बने रहने से केंद्र सरकार में ऐसा अहंकार आ चुका है कि युवाओं की चीखें संसद के बंद दरवाज़ों तक नहीं पहुँच पा रही हैं?

नैतिक जिम्मेदारी का अभाव: धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा क्यों नहीं?

लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी बड़े प्रशासनिक या नीतिगत पतन पर संबंधित मंत्री की नैतिक जिम्मेदारी तय होना सर्वोपरि रहा है। लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल दुर्घटना के बाद इस्तीफा दे दिया था—यह भारतीय राजनीति का नैतिक मानदंड था।

  • बड़ा सवाल: जब बार-बार पेपर लीक हो रहे हैं, लाखों युवाओं का भविष्य दांव पर लगा है और कई होनहार छात्र अपनी जान तक गंवा चुके हैं, तो शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा मांगने या उन्हें पद से हटाने की जिद्द क्यों नहीं दिखती?
  • किसी मंत्री का पद किसी की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं है। आज कोई और है, कल कोई और होगा। लेकिन इस मामले पर टस से मस न होना यह संदेश देता है कि सरकार के लिए जनता के आक्रोश से ज्यादा अपनी ‘छवि’ और ‘राजनीतिक जिद’ मायने रखती है।

जंतर-मंतर की क्रूरता: क्या यह लोकतंत्र है या तंत्र का हिटलरशाही रवैया?

20 जुलाई को जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, उसने देश के प्रशासनिक नियमों की धज्जियाँ उड़ा दीं।

  • गैर-कानूनी रवैया: बिना वर्दी, बिना नेम-बैज और चप्पलों में डंडा लेकर घूमते कर्मियों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं, महिलाओं और बेटियों पर लाठियां भांजना सीधे तौर पर पुलिस मैनुअल और मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
  • जब सवाल पूछने पर युवाओं को थप्पड़ मारे जाएं और मीडिया के सामने उन्हें खदेड़ा जाए, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या प्रशासनिक तंत्र रक्षक से भक्षक बन चुका है?
  • हिंसा किसी भी पक्ष से हो—चाहे पुलिस की तरफ से या प्रदर्शनकारियों की तरफ से—गलत है। लेकिन सवाल यह है कि स्थिति को इस खतरनाक मोड़ तक आने ही क्यों दिया गया?

‘आंदोलन’ के पीछे राजनीति का नया मोहरा?

एक तरफ जहाँ युवा लाठियां खा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पर्दे के पीछे एक नई राजनीति बुनी जा रही है।

  • जिस प्रकार नई-नई राजनीतिक पार्टियों (जैसे कॉकरोच जनता पार्टी) का अचानक से उभार हो रहा है, उसमें कहीं न कहीं पर्दे के पीछे से सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका संदिग्ध दिखाई देती है।
  • क्या युवाओं के इस वास्तविक और निष्पक्ष आक्रोश को दबाने या भटकाने के लिए सुनियोजित तरीके से नए ‘मोहरे’ खड़े किए जा रहे हैं?
  • ‘वशिष्ठ वाणी’ का सीधा रुख: सरकार हो या राजनीतिक दल, वे यह भूल रहे हैं कि भारत में लोकतंत्र अमर है, सत्ता हमेशा के लिए किसी एक व्यक्ति या दल की नहीं होती। आज जो सत्ता में हैं, कल वे विपक्ष में होंगे।

भविष्य का खतरा: जब जनता का धैर्य टूटता है

इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता के अहंकार ने जनता और युवाओं की जायज मांगों को अनसुना किया है, तब-तब उसका खामियाजा लोकतंत्र को भुगतना पड़ा है।

  • यदि सरकार ने समय रहते अपनी रणनीतिक जिद को छोड़कर युवाओं से सीधे संवाद नहीं किया और नैतिक जवाबदेही तय नहीं की, तो आने वाला समय देश के सामाजिक और राजनीतिक स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

‘वशिष्ठ वाणी’ के तीखे कानूनी व संवैधानिक सवाल:

  1. क्या पेपर लीक जैसी राष्ट्रीय त्रासदी के बाद भी शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी तय न होना प्रशासनिक अहंकार की पराकाष्ठा नहीं है?
  2. बिना नेम बैज और सिविल ड्रेस में युवाओं पर लाठीचार्ज करने वाले अधिकारियों पर अब तक कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
  3. क्या सत्ताधारियों को यह याद दिलाने की जरूरत है कि भारतीय संविधान में ‘प्रजा’ नहीं, ‘नागरिक’ रहते हैं और जनता ही सर्वोपरि है?

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