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राम मंदिर चढ़ावा और मध्य प्रदेश का जमीन विवाद: प्रधानमंत्री की चुप्पी पर उठे सवाल

‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ का नारा क्या अब महज एक जुमला? आस्था और सत्ता के गलियारों में सन्नाटे से जनता हैरान!

नई दिल्ली/अयोध्या: एक समय था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह नारा—“न खाऊंगा, न खाने दूंगा”—देश की राजनीति में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़े संकल्प के रूप में देखा जाता था। लेकिन आज, जब करोड़ों राम भक्तों की आस्था के केंद्र ‘राम मंदिर’ में चढ़ावे (दान) की हेराफेरी का मामला सामने आया है, तो प्रधानमंत्री की यह ‘चुप्पी’ कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

राम मंदिर में चढ़ावे का ‘खेल’ और PM की चुप्पी

जिस राम मंदिर के निर्माण का श्रेय लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई, आज उसी मंदिर के भीतर से चढ़ावा गायब हो रहा है। यह कोई छोटी घटना नहीं, बल्कि आस्था के साथ एक बड़ा विश्वासघात है। ‘वशिष्ठ वाणी’ पूछना चाहता है कि जब बात मंदिर की सुरक्षा और दान की शुचिता की है, तो प्रधानमंत्री इस पर एक शब्द भी क्यों नहीं बोल रहे हैं? जनता जानना चाहती है कि देश की जांच एजेंसियां—ED और CBI—इस गंभीर मामले में कहां गायब हैं? क्या मंदिर में हो रही इस चोरी पर कोई कार्रवाई नहीं होगी?

मुख्यमंत्री मोहन यादव और जमीन विवाद का ‘खुलासा’

प्रधानमंत्री की चुप्पी केवल राम मंदिर तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव से जुड़ा जमीन विवाद का मामला सामने आने के बाद भी प्रधानमंत्री पूरी तरह से खामोश हैं। एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान ने जिस तरह से इस घोटाले का खुलासा किया है, उसने न केवल राज्य की राजनीति को हिला दिया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सरकार की छवि पर सवाल खड़े किए हैं। आखिर इस मामले पर PM की चुप्पी क्यों?

क्या ‘मौन प्रधानमंत्री’ का दौर लौट आया है?

आज की स्थिति को देखकर पुराने दिनों की यादें ताजा हो रही हैं, जब पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को ‘मौन प्रधानमंत्री’ कहा जाता था। क्या आज इतिहास खुद को दोहरा रहा है? जब सत्ता शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को अपने ही दल के मुख्यमंत्रियों या धार्मिक ट्रस्टों की कथित अनियमितताओं पर बोलने की जरूरत होती है, तब यह चुप्पी कई तरह की आशंकाओं को जन्म देती है।

जनता के सवालों का जवाब कब?

आज जनता का भरोसा डगमगा रहा है। जब मंदिर की पवित्रता और सरकारी ईमानदारी पर सवाल उठते हैं, तो जनता जवाब की अपेक्षा करती है। क्या ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ का संकल्प केवल चुनावी मंचों तक सीमित था?

‘वशिष्ठ वाणी’ के माध्यम से हम सवाल करते हैं—क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई सिर्फ विरोधियों के लिए है, या सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों के लिए भी नियम वही हैं? अब समय आ गया है कि इस चुप्पी को तोड़ा जाए, क्योंकि इतिहास और जनता, दोनों ही जवाब मांगते हैं।

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