इंदौर। इंदौर के बी जौन बिजनेस पार्क में बीते रविवार को किशोरों की एक टीम ने समाज में बदलाव का अनूठा उदाहरण पेश किया। ऑटिज्म (स्वलीनता) जैसी स्थिति के प्रति समाज में फैली भ्रांतियों को मिटाने और समावेशिता का संदेश देने के उद्देश्य से ‘मियावाकी कार्निवल’ का सफल आयोजन किया गया।
ऑटिज्म के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता
कार्यक्रम में उपस्थित विशेषज्ञों ने ऑटिज्म को समझने पर जोर दिया। स्पीच थेरेपिस्ट डॉ. गरिमा दीक्षित ने बताया कि प्रति 60 में से एक बच्चा ऑटिज्म से प्रभावित है, जिसे शुरुआती दौर में पहचानना और जागरूक होना बेहद आवश्यक है। वहीं, ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट डॉ. अनुष्का जैन ने समाज से अपील की कि वे रूढ़िवादी सोच को छोड़कर इन बच्चों को मुख्यधारा में शामिल करें और इनके साथ दूरी को मिटाएं।
‘मियावाकी’ सिद्धांत: साथ बढ़ने का संदेश
कार्यक्रम की निर्देशिका नेहा कनोडिया और टीम की सदस्य तारिणी कस्बेकर ने बताया कि कार्निवल का नाम ‘मियावाकी’ विधि पर रखा गया है, जिसमें पौधे साथ मिलकर तेजी से विकसित होते हैं। इसी सिद्धांत को आधार बनाकर किशोरों ने समाज को संदेश दिया कि जाति, नस्ल, आर्थिक स्थिति या ऑटिज्म के भेदभाव को भुलाकर हमें एक साथ आगे बढ़ना चाहिए।
‘बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिए’
इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसका पूरा संचालन किशोरों की टीम—अरिंजय जैन, तारिणी कस्बेकर, शरन्या उपाध्याय और मिराया गांधी द्वारा किया गया। कार्यक्रम में ऑटिस्टिक बच्चों ने गायन और पियानो की प्रस्तुति दी, साथ ही स्टॉल लगाकर व्यावहारिक कौशल भी सीखे। अन्य किशोरों ने भी स्वहस्तनिर्मित उत्पादों और मनोरंजक खेलों के स्टॉल लगाकर सहयोग दिया।
यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि यदि युवा पीढ़ी ठान ले, तो वे समाज में न केवल जागरूकता ला सकते हैं, बल्कि सकारात्मक बदलाव की एक नई इबारत भी लिख सकते हैं।








