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‘मलाई’ के आगे सिस्टम सरेंडर? जब एक महिला RTO अधिकारी ही न्याय के लिए लाचार है, तो आम जनता का तो भगवान ही मालिक है!

रास्ता बंद, सुनवाई बंद, इंसाफ बंद! 29 जुलाई 2025 से फाइल दबाकर बैठे गोरेगांव कलेक्टर ऑफिस के साहब; आखिर किसका ‘वरदहस्त’ है?

मुंबई | मालाड (पश्चिम) | विशेष रिपोर्ट

कहते हैं कि देश में कानून का राज है, लेकिन मुंबई के प्रशासनिक गलियारों को देखकर लगता है कि यहाँ सिर्फ ‘रसूख और नोटों’ का राज चलता है। जब एक सरकारी पद पर बैठी महिला अधिकारी (RTO Officer) को अपने हक के लिए दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते एड़ियां घिसनी पड़ जाएं, तो समझ लीजिए कि आम आदमी की हैसियत इस सिस्टम के सामने एक कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं है। यह शर्मनाक और आंखें खोलने वाला मामला मालाड पश्चिम के एरंगळ गांव से सामने आया है।

योगाश्रम, बुल्लर गार्डन, एरंगळ विलेज, दाणापाणी, मालाड (प.), मुंबई-400061 में रहने वाली नेहा निलेश वालावलकर पिछले कई महीनों से अपने ही घर के रास्ते के लिए सिस्टम के आगे हाथ जोड़ रही हैं। दबंगई की पराकाष्ठा देखिए—उनके घर से बाहर निकलने का मुख्य रास्ता इस कदर ब्लॉक कर दिया गया है कि वहां से इंसान का निकलना भी दूभर है। चारों तरफ लटकते तार और संकरी गली देखकर लगता है कि प्रशासन ने मान लिया है कि आम जनता इंसान नहीं, बल्कि सर्कस के कलाकार हैं जो रस्सियों पर लटककर अपने घर जाएंगे!

लाचारी की पराकाष्ठा: अपनी ही छत के लिए दर-दर भटकीं नेहा

प्रशासनिक ढिठाई का असर यह हुआ कि रास्ता न होने के कारण यह महिला अधिकारी लगभग एक साल तक अपना ही घर बंद करके बाहर किराए के मकान में रहने को मजबूर रहीं। लेकिन आज के इस महंगाई के दौर में, जहाँ घर चलाना मुश्किल है, वहां कब तक कोई भारी-भरकम किराया भरता? आखिर में जब जेब ने गवाही नहीं दी, तो मजबूरी में वो वापस इसी नरक जैसी स्थिति में रहने को लौट आईं।

बड़ा सवाल: जो महिला अधिकारी खुद पूरे घर को अकेले संभाल रही है, अपनी मेहनत की कमाई से टैक्स भर रही है, उसे अपनी ही छत के नीचे कैदी की तरह रहने पर क्यों मजबूर किया जा रहा है? क्या हमारे देश में ईमानदारी से जीना ही सबसे बड़ा अपराध है?


कलेक्टर कार्यालय की ‘कुंभकर्णी नींद’ और विनय पाडवी जी के ‘खोखले आश्वासन’

नेहा वालावलकर ने दिनांक 29 जुलाई 2025 को गोरेगांव कलेक्टर कार्यालय में बकायदा लिखित शिकायत दर्ज कराई थी। इस मामले के जिम्मेदार अधिकारी विनायक पाडवी जी (Deputy Collector) हर बार शिकायतकर्ता को यह कहकर टरका देते हैं कि—“हम आ रहे हैं, जांच कर रहे हैं, कार्रवाई होगी।”

साहब! आपकी वह ‘कार्रवाई की गाड़ी’ गोरेगांव से मालाड तक पहुँचने में कितने साल लगाएगी? या फिर आपकी कुर्सी पर फेविकोल का ऐसा मजबूत जोड़ लगा है कि जांच के लिए फील्ड पर जाने का कष्ट ही नहीं हो पाता?

महीनों बीत गए, लेकिन जमीन पर कोई बदलाव नहीं दिखा। अब जनता को यह समझने में देर नहीं लगेगी कि यह सुस्ती कोई साधारण सुस्ती नहीं है, बल्कि इसके पीछे ‘पावर, पैसा और रसूख’ का वो कॉकटेल है जो अक्सर बड़े-बड़े अधिकारियों की आंखों पर पट्टी बांध देता है।


  • क्या शिकायत में दम नहीं है, या सामने वाले के रसूख में ज्यादा दम है?
  • क्या जांच वाकई चल रही है, या उसे फाइलों के ऐसे मलबे में दबा दिया गया है जहाँ से इंसाफ कभी जिंदा बाहर न आ सके?
  • अगर सब कुछ साफ है, तो मौके पर जाकर उस अवैध ब्लॉकेज को हटाने में अधिकारियों के हाथ क्यों कांप रहे हैं?

पढ़े-लिखे अधिकारी या सिर्फ ‘मलाई’ खाने के जुगाड़ू?

जनता बड़े चाव और उम्मीद से इन अधिकारियों को चुनती है कि ये लोग पढ़-लिखकर देश की सेवा करेंगे। लेकिन अफसोस, कुर्सी पर बैठते ही जनसेवा का संकल्प ‘मलाई खाने के जुगाड़’ में बदल जाता है। जहाँ पैसा फेंका जाता है, वहां तो यह सिस्टम रात के 12 बजे भी दौड़कर कार्रवाई करने पहुँच जाता है। लेकिन जहाँ एक लाचार, बेबस और बिना किसी गॉडफादर की महिला गुहार लगाती है, वहां कानून की धाराएं और अधिकारियों के पैर दोनों पंगु हो जाते हैं।

अगर आज यही घटना किसी मंत्री या बड़े अधिकारी के परिवार के साथ हुई होती, तो अब तक पूरा बुलडोजर दस्ता वहां पहुंच चुका होता और रास्ता चकाचक हो गया होता। लेकिन यहाँ मामला एक आम महिला का है, तो फाइल पर धूल की परतें जमा होना लाजमी है।


मुख्यमंत्री, मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी अब तो आंखें खोलिए!

“वशिष्ठ वाणी” इस रिपोर्ट के माध्यम से जिला प्रशासन, राज्य सरकार और संबंधित मंत्रियों से सीधे तौर पर यह मांग करते हैं कि इस मामले का तुरंत संज्ञान लिया जाए।

हम यह साफ कर देना चाहते हैं कि यदि इस तीखी रिपोर्ट के बाद भी गोरेगांव कलेक्टर ऑफिस की नींद नहीं टूटी और नेहा जी को न्याय नहीं मिला, तो हमारी लीगल टीम इस लड़ाई को कोर्ट तक लेकर जाएगी। हम चुप बैठने वाले नहीं हैं।

अब फैसला प्रशासन को करना है: क्या आप अपनी कुर्सियों का फर्ज निभाएंगे या फिर सिद्ध कर देंगे कि इस सिस्टम में सिर्फ पैसे वालों की ही सुनवाई होती है? जनता की नजरें आप पर हैं, साहब!

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