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52 दिन, 1248 घंटे… और सांसद पीयूष गोयल का ‘मौन’ व्रत! क्या मालाड का ‘कर्सन’ कानून से भी ऊपर है?

विशेष खोजी रिपोर्ट: वशिष्ठ वाणी ब्यूरो मालाड (मुंबई): उत्तर मुंबई के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों केवल एक ही यक्ष प्रश्न गूंज रहा है—क्या मुंबई का प्रशासन बिक चुका है, या फिर सत्ता के रसूख ने कानून की आँखों पर पट्टी बांध दी है? मालाड वेस्ट के भद्रन नगर, रोड नंबर 1, रेलवे ट्रैक के पास स्थित ‘कोयला वाला गली’ में सीना ताने खड़ा यह अवैध निर्माण अब महज ईंट-पत्थर का बेजान ढांचा नहीं रह गया है। यह ढांचा अब स्थानीय सांसद और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल की ‘जीरो टॉलरेंस’ वाली कार्यशैली और दावों पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान बन चुका है।

दिल्ली में ‘सुशासन’ के नारे, मालाड में भू-माफिया के ठाठ!

जो सांसद और मंत्री दिल्ली के मंचों से ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ और ‘पारदर्शी शासन’ की कसमें खाते नहीं थकते, उनके अपने ही संसदीय क्षेत्र में एक कथित माफिया ‘कर्सन’ तमाम कायदे-कानूनों को ठेंगे पर रखकर अवैध निर्माण खड़ा कर देता है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि मीडिया द्वारा लगातार 52 दिनों से इस मुद्दे पर निरंतर रिपोर्टिंग की जा रही है, सारे सबूत सार्वजनिक किए जा चुके हैं, लेकिन सांसद महोदय की ‘रहस्यमयी चुप्पी’ टूटने का नाम नहीं ले रही।

बड़ा सवाल: क्या एक कद्दावर केंद्रीय मंत्री और सांसद इतने बेबस हैं कि अपने ही क्षेत्र में एक अवैध इमारत पर बुलडोजर नहीं चलवा पा रहे? या फिर ‘कोयला वाली गली’ की इस कालिख ने स्थानीय राजनीतिक और प्रशासनिक सिस्टम की चमक को पूरी तरह से धुंधला कर दिया है?


सहायक आयुक्त कुंदन वळवी की ‘कुंभकर्णी’ नींद का राज क्या है?

इस पूरे खेल में बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के पी/उत्तर (P/North) वार्ड की भूमिका सबसे ज्यादा संदिग्ध है। सहायक आयुक्त कुंदन वळवी के दफ्तर में 21 मई 2025 का नोटिस फाइलों के नीचे दबा धूल फांक रहा है।


पिछले 52 दिनों से मीडिया लगातार पक्के प्रमाण और तस्वीरें सामने रख रहा है, लेकिन वळवी जी का अतिक्रमण विरोधी दस्ता मालाड की इन गलियों तक पहुंचने का रास्ता ही भूल गया है। जनता अब खुलेआम पूछ रही है कि यह महज़ प्रशासनिक सुस्ती है, भू-माफिया के प्रति कोई विशेष ‘सद्भावना’ है, या फिर इसके पीछे अंदरूनी ‘सांठगांठ’ का कोई बड़ा खेल चल रहा है?


जनता की अदालत में प्रशासन और सांसद से 5 तीखे सवाल:

  1. सांसद जी, जवाब दीजिए: क्या आपकी भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति इस भू-माफिया ‘कर्सन’ के अवैध निर्माण के आगे सरेंडर कर चुकी है?
  2. जनता का अपमान क्यों?: पिछले 52 दिनों से लगातार हो रही इस मीडिया रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को सिरे से नजरअंदाज करना क्या उत्तर मुंबई के मतदाताओं का खुला अपमान नहीं है?
  3. BMC कमिश्नर से क्या छुपाया जा रहा है?: पी/उत्तर वार्ड के स्तर पर चल रहे इस घालमेल और शिकायत की फाइल को बीएमसी कमिश्नर की टेबल तक पहुंचने से रोकने वाला वो ‘अदृश्य हाथ’ किसका है?
  4. किसकी तिजोरी से जुड़े हैं तार?: क्या अवैध निर्माण करने वाले इस ‘कर्सन’ के तार किसी बड़ी राजनीतिक तिजोरी या रसूखदार आका से जुड़े हैं, जो पूरा तंत्र उसे छूने से भी डर रहा है?
  5. कार्रवाई से डर कैसा?: नोटिस के बावजूद 52 दिनों तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वाले सहायक आयुक्त कुंदन वळवी पर अब तक कोई विभागीय या अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

निष्कर्ष:

लोकतंत्र में जब रक्षक ही मौन साध ले, तो भक्षक के हौसले बुलंद होना लाजिमी है। मालाड की ‘कोयला वाली गली’ का यह विवाद अब सिर्फ एक अवैध निर्माण का मामला नहीं रहा, बल्कि यह जवाबदेही बनाम भ्रष्टाचार की लड़ाई बन चुका है। देखना यह है कि इस तीखे सच के सामने आने के बाद भी प्रशासन ‘मौन व्रत’ पर रहता है या फिर कानून का डंडा अपना काम करता है।

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